सबके लिए पानी

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water for all mahatma jyotirao phules historic step against casteism
यह बात उस समय की है, जब महाराष्ट्र में जातिवाद और छुआछूत चरम पर थी। निम्न वर्ग के लोगों को सार्वजनिक कुओं और तालाबों से पानी लेने तक की मनाही थी। महात्मा ज्योतिराव फुले इस अमानवीय व्यवस्था से बेहद आहत थे। एक दिन उन्होंने देखा कि कुछ लोग प्यास से तड़प रहे हैं। उन्होंने बिना किसी भेदभाव के अपने घर के बाहर बने पानी के हौद को सभी वर्गों के लिए खोल दिया। उनके इस कदम का कुछ परंपरावादियों ने विरोध किया। ज्योतिबा ने शांत स्वर में कहा, ‘आप सभी ईश्वर की पूजा करते हैं। हमारे देश में कृष्ण की पूजा होती है और लोग उनके उपदेश सुनने के लिए लालायित रहते हैं। लेकिन, केवल उपदेश सुनना ही पर्याप्त नहीं है। यदि उनके संदेश को जीवन में उतार नहीं सकते, तो पूजा का क्या अर्थ?’ उन्होंने आगे कहा, ‘कृष्ण ने ग्वाल-बालों और समाज के हर वर्ग को अपनाया। उन्होंने कभी किसी में ऊंच-नीच का भेद नहीं किया। फिर उनके भक्त किसी मनुष्य को केवल उसकी जाति के कारण पानी पीने से कैसे रोक सकते हैं?’ ज्योतिबा की बातें उन परंपरावादियों की समझ में आ चुकी थीं। उनके सिर शर्म से झुक गए।