Chinas Big Move Before Xi Jinpings India Visit Again Demands Package Deal On Border Dispute
लेन-देन से दूर होगा सीमा विवाद
नवभारतटाइम्स.कॉम•
नई दिल्ली में 12-13 सितंबर को होने वाले BRICS समिट में चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग शिरकत कर सकते हैं। शी के संभावित दौरे से पहले चीन ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए पैकेज समझौते की बात फिर दोहराई है। शी से पहले 1959 में चीन के प्रधानमंत्री चओ एन लाए और 1979 में चीन के शिखर पुरुष तंग श्याओ फिंग भी ऐसी पेशकश कर चुके हैं। 1979 में तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पेइचिंग दौरे में तंग ने नेफा भारत के पास रखने और अक्साई चिन पर चीन का अधिकार मानने की पेशकश की थी, जिसे उन्होंने ठुकरा दिया था।
बातचीत बेनतीजा । बाद की सरकारों ने चीन के साथ 3,488 किमी लंबी सीमा के समाधान के लिए पूर्वी (अरुणाचल प्रदेश व सिक्किम), मध्य (उत्तराखंड व हिमाचल) और पश्चिमी (लद्दाख) सेक्टरों में अलग-अलग बातचीत पर जोर दिया। लेकिन, सीमा विवाद और उलझता गया। 1980 के दशक में संयुक्त सचिव स्तर के संयुक्त कार्यदल के गठन से लेकर अब तक, विशेष प्रतिनिधियों के स्तर पर बातचीत के 25 दौर हुए हैं, पर नतीजा नहीं निकला।राजनीतिक समझौता । शायद भारत भी इस अंतहीन बातचीत से हताश होकर चीन के पैकेज समझौते पर अप्रत्यक्ष तौर पर सहमत हो गया है। भारतीय शब्दावली में इसे राजनीतिक समाधान कहा जा रहा है। संभवतः पैकेज समाधान को भारत में नकारात्मक नजरिये से देखे जाने के कारण भारत ने इसे राजनीतिक समझौता कहा है।
समाधान जरूरी । भारत और चीन के बीच सीमा विवाद के हिंसक झड़पों में बदलने से रिश्तों में तनाव बढ़ा है। वास्तविक नियंत्रण रेखा की चौकसी के लिए बर्फीले पर्वतों पर हजारों सैनिकों की तैनाती से देश पर वित्तीय बोझ भी बढ़ा है। वहीं, चीनी नेतृत्व ने भी देखा है कि भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश है, जिसके साथ जोर-जबरदस्ती नहीं की जा सकती। भारत भी चीन से बलपूर्वक अक्साई चिन नहीं ले सकता। दोनों को सोचना होगा कि इस दलदल से कैसे निकलें।
चीनी चाल । सीमा पर शांति से दोनों देशों के बीच दुश्मनी की भावना भी खत्म होगी। लेकिन, शायद चीन को लगता है कि भारत के लिए सीमा समझौता मजबूरी है। इसी का फायदा उठाने के इरादे से उसने चओ एन लाए और तंग श्याओ फिंग के मूल पैकेज प्रस्ताव का इलाकाई दायरा इतना बढ़ा दिया है कि भारत की कोई भी सरकार इसे स्वीकार नहीं कर सकती। इसके लिए उसे युद्ध का रास्ता ही क्यों न चुनना पड़े।
स्पष्टता नहीं । हालांकि, चीन ने इसका खुलासा नहीं किया है कि पैकेज समाधान के तहत वह भारत से किन इलाकों की मांग कर रहा है। लेकिन, चीन दौरे में चीनी अधिकारियों ने मुझसे कहा था कि अरुणाचल प्रदेश के तवांग और लद्दाख के कुछ सीमांत इलाकों को भारत देने को तैयार हो तो समझौता हो सकता है। चीनी विशेषज्ञों के मुताबिक, तवांग तिब्बत की राजधानी ल्हासा के बाद तिब्बती समुदाय का दूसरा बड़ा मठ शहर है, इसलिए वह चीन का स्वाभाविक इलाका है। इस तरह चीन 1959 और 1979 के प्रस्तावों से काफी आगे जाकर भारत से मांग कर रहा है।
जनता की भावना । दोनों देशों के विशेष प्रतिनिधियों, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और चीनी विदेश मंत्री वांग यी के बीच 25वें दौर की बातचीत के बाद 2005 का समझौता याद कराया गया। इसमें सीमा विवाद के समाधान के लिए राजनीतिक मापदंड और मार्गदर्शक सिद्धांत तय किए गए थे। समझौते में यह भी कहा गया कि सीमा निर्धारण के दौरान दोनों देश एक-दूसरे के इलाकों में बसी आबादी की भावनाओं का सम्मान करेंगे। शायद इसी वजह से चीन ने अरुणाचल के सीमांत इलाकों में बड़ी संख्या में बस्तियां बसाई हैं, ताकि जनसंख्या का पलड़ा उसके पक्ष में हो सके।
वार्ता से संकेत । अब देखना होगा कि भारत चीन की रणनीति को कैसे बेअसर करता है। चीन के नाम वाले नक्शों के जवाब में भारत ने अरुणाचल के भारतीय नामों वाला नक्शा जारी किया। अब 26वें दौर की बातचीत 2027 में होगी। तब तक शी-मोदी वार्ता से रुख का संकेत मिल सकता है।