इंटरनेट के ज़माने में बचानी होंगी लघु पत्रिकाएं

नवभारतटाइम्स.कॉम
survival of little magazines in the internet age a serious challenge
इस शताब्दी का एक चौथाई हिस्सा बीत चुका है। इंटरनेट की सर्वोच्च सत्ता को व्यापक स्वीकृति मिल चुकी है। ऐसे में छपी हुई साहित्य-संस्कृति विषयक लघु पत्रिकाओं का औचित्य खोजना चुनौतीपूर्ण है। आज लघु पत्रिका दिवस है। जयपुर में 2001 के लघु पत्रिका सम्मेलन में तय हुआ था कि आधुनिक हिंदी के निर्माता भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की जयंती, 9 सितंबर को इस दिवस के रूप में मनाया जाए।

बढ़ता संकट । तब से अब तक इन पत्रिकाओं की स्थिति और चुनौतीपूर्ण हुई है। महंगी छपाई, कागज और बढ़ती डाक दरों ने संकट बढ़ाया है। दूसरी ओर अखबारों में साहित्य की जगह लगातार कम हुई है। ऐसे में भाषा, संस्कृति और साहित्य का मंच इन पत्रिकाओं से ही बनता है। भाषा-संस्कृति की पढ़ाई करने वाली युवा पीढ़ी के लिए भी ये पत्रिकाएं महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
बदलता दौर । हिंदी में लघु पत्रिका आंदोलन सातवें दशक में जनधर्मी सांस्कृतिक पत्रकारिता के उत्साह के साथ शुरू हुआ। देश के छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से लेखकों व संस्कृति कर्मियों ने पत्रिकाएं प्रकाशित कीं। यह उत्साह दो-तीन दशकों तक कायम रहा, लेकिन संचार क्रांति के बाद कागज पर छपने वाले शब्दों की जगह धीरे-धीरे इंटरनेट पत्रकारिता ने ले ली।

पत्रिकाएं जरूरी । अब संचार क्रांति के भी तीन दशक से अधिक हो गए हैं और Gen Z का दौर आ गया है। ऐसे में लघु पत्रिकाओं की स्थिति देखना दिलचस्प होगा। हमारे जमाने में तद्भव, उद्भावना, पक्षधर, अकार जैसी लघु पत्रिकाओं के साथ-साथ हंस, कथादेश, पाखी, समयांतर, सबलोग, वागर्थ जैसी मासिक पत्रिकाओं को जीवंत परिदृश्य समझने के लिए जरूरी माना जाता था। अगर किसी लेखक ने कोई किताब लिखी और वह प्रकाशित हो जाती है, तो वह साहित्य का फाइनल प्रॉडक्ट माना जाता था। लेकिन, पत्रिकाएं बहते पानी को दिखाने की कोशिश हैं।

पाठकों से कनेक्शन । साहित्य का जीवंत वातावरण, बहसें और गतिविधियां इन पत्रिकाओं के जरिये पाठकों तक पहुंचती हैं। हिंदी की करीब 400 लघु पत्रिकाएं लेखकों और दूर-दराज के पाठकों को जोड़ने का काम कर रही हैं। पिछली आधी शताब्दी की चर्चित कहानियां, कविताएं, संस्मरण और लघु उपन्यास भी इन्हीं पत्रिकाओं के जरिए पहली बार पाठकों तक पहुंचे।

छपे शब्दों का महत्व । टेक्नॉलजी ने ई-पत्रिकाओं को आसानी से आगे बढ़ाया है। लेकिन, कागज पर छपे शब्दों का महत्व आज भी बरकरार है। कम पूंजी और निजी प्रयासों से निकलने वाली साहित्य-संस्कृति की पत्रिकाएं भारतीय संस्कृति व जनजीवन का पक्ष मजबूती से सामने लाती हैं, जो बाजार और विज्ञापन के दबाव वाले बड़े मंचों पर संभव नहीं। बाजार की आपाधापी के बीच साहित्य मनुष्यता के लिए जरूरी संवेदनाओं को बचाने की कोशिश करता है। हिंदी की लघु पत्रिकाएं इसी जिद और प्रतिबद्धता का उदाहरण हैं।

(लेखक हिंदू कॉलेज में प्रफेसर हैं)