Harappan like Civilization Found On Vaiparoo Riverbank Evidence Of Ancient Water Management And Advanced Urban Planning Found In Tamil Nadu
वैप्पारू किनारे थी हड़प्पा जैसी सभ्यता
नवभारतटाइम्स.कॉम•
तमिलनाडु के तेनकासी जिले के करिवलमवंदनल्लूर इलाके में वैप्पारू नदी के किनारे उत्खनन जारी है। सदियों से मिट्टी की परतों में दबी ईंटों की संरचनाएं, जल प्रबंधन की उन्नत प्रणालियां और मिले दूसरे पुरावशेष एक ऐसी सभ्यता की कहानी कह रहे हैं, जो समय के साथ भले ही ओझल हो गई, लेकिन उसके निशान आज भी मौजूद हैं। इतिहास केवल ग्रंथों, शिलालेखों और दस्तावेजों में दर्ज नहीं होता - वह धरती की परतों में भी सांस लेता है। कभी एक ईंट, कभी मिट्टी में दबा कोई छोटा-सा पुरावशेष हमें उस दौर के जीवन, तकनीक और समाज की झलक दिखा देता है। वैप्पारू के किनारे हो रहा उत्खनन इसी भूली-बिसरी कहानी को सामने लाने की कोशिश है।
वैज्ञानिक सोच के सबूत । इस जगह से मिले साक्ष्य बताते हैं कि भारतीय सभ्यता का विकास वैज्ञानिक सोच, सुव्यवस्थित नगर नियोजन और प्रभावी जल प्रबंधन पर आधारित था। उत्तरी तमिलनाडु के कई पुरास्थलों पर मध्य पाषाण, नवपाषाण और लौह युग के बीच क्रमिक सांस्कृतिक बदलाव दिखाई देते हैं। वहीं, करिवलमवंदनल्लूर के उत्खनन से इस क्षेत्र में इंसानी बसावट और नगर नियोजन की परंपरा के महत्वपूर्ण प्रमाण मिले हैं। ऐसा सांस्कृतिक क्रम मंगुडी, शिवगलाई और आदिचनल्लूर की खुदाइयों में भी सामने आ चुका है। शिवगलाई से 3345 ईसा पूर्व के लौह औजार मिले हैं, जो पिघलाकर बनाए गए लौहे के सबसे पुराने ज्ञात सबूतों में से एक हैं।रोमन व्यापार के प्रमाण । इस क्षेत्र से काली मिर्च, हाथी दांत, रेशम, मोती, मलमल, नीलम और शंख जैसी वस्तुओं का पश्चिमी देशों को निर्यात किया जाता था। करिवलमवंदनल्लूर में तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग अब तक 18 वैज्ञानिक ट्रेंच खोद चुका है। यहां की सबसे महत्वपूर्ण खोज लगभग 2500 वर्ष पुरानी ईंटों से बनी 8.7×4.2 मीटर की एक विशाल सीढ़ीदार संरचना है।
यह खोज साबित करती है कि जल प्रबंधन और संसाधनों के संरक्षण की विकसित व्यवस्था हजारों साल पहले भी मौजूद थी। इसकी ईंटें कीलाडी, अलगनकुलम और पंपुहार से मिली ईंटों से काफी मिलती-जुलती हैं। संगम काल (300 ईसा पूर्व–300 ईस्वी) को तमिल साहित्य, व्यापार, कृषि और संस्कृति का स्वर्णकाल माना जाता है।
संगम साहित्य में उल्लेख । उत्खनन में लाल परत वाले एक बड़े दफन पात्र के ऊपरी हिस्से पर मोर की आकृतियां मिली हैं। इसके बाहर मिले दांत और नीचे रखे काले-लाल बर्तन से संकेत मिलता है कि इसका उपयोग शव दफनाने के लिए किया जाता था। शोधकर्ताओं के अनुसार, ऐसी परंपरा का संबंध पहले हड़प्पा, हुलास, भिर्राना और पोरुनथल जैसे पुरास्थलों से भी रहा है। संगम साहित्य के ग्रंथ 'अकनानूरु' में भी स्मारकों को मोर-पंखों से सजाने का उल्लेख मिलता है। हड़प्पा (पाकिस्तान), हुलास (सहारनपुर, यूपी) और भिर्राना (फतेहाबाद, हरियाणा) में मिले ऐसे ही बर्तनों पर मोरों की आकृति बनी हुई हैं, जिनके अंदर लेटे हुए इंसानों के पुरावशेष हैं। अभी तक की खुदाई में लोहे के औजार, शंख की चूड़ियां, टेराकोटा के तकुए, टेराकोटा डिस्क, मूंगे और सोने के मनके, खेल-गोटी, तांबे के सिक्के मिले हैं। ये साक्ष्य बताते हैं कि करिवलमवंदनल्लूर केवल एक सामान्य इंसानी बस्ती नहीं, शिल्प, उत्पादन और व्यापार का विकसित केंद्र था। यह इलाका संगम काल में व्यापक क्षेत्रीय और समुद्री व्यापार से जुड़ा हुआ था।