सत्य निकेतन के मलबे में तबाही का इतिहास

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एक तरफ रिंग रोड पर लगातार भागती गाड़ियां, दूसरी तरफ दिल्ली विश्वविद्यालय का साउथ कैंपस। गलियों में पीजी के बोर्ड, कैफे, फोटोकॉपी की दुकानें और कोचिंग सेंटर। लगता है कि सत्य निकेतन स्टूडेंट्स के लिए ही बना हो। यहीं पर एक पांच मंजिला इमारत गिरी है। यह हादसा उस लंबे सफर का आखिरी और सबसे कड़वा पन्ना है, जिसमें एक छोटा-सा गांव-बस्ती वाला इलाका धीरे-धीरे ऊंची, भीड़भरी इमारतों का अड्डा बन गया।

पुराना नाम । सत्य निकेतन कभी मोची गांव या मोची बाग के नाम से पहचाना जाता था। सरकारी कागजों में नाम और भी पुराना है, अरकपुर बाग मोची। मशहूर इतिहासकार आरवी स्मिथ बताते थे कि आजादी के बाद जब चाणक्यपुरी और दक्षिण दिल्ली की सरकारी कॉलोनियां बनने लगीं, तो बड़े अफसरों को 'मोची बाग' नाम खुरदुरा लगा। सो नाम बदलकर मोती बाग कर दिया गया। नब्बे के दशक के आसपास तक यहां छोटे घर थे।
पहली पुनर्वास कॉलोनी । मौजूदा सत्य निकेतन कुछ और है। साठ के दशक के आखिर में दिल्ली विकास प्राधिकरण ने झुग्गी-झोपड़ी हटाओ योजना के तहत यहां प्लॉट काटे। दिल्ली की पहली पुनर्वास कॉलोनियों में यह इलाका भी था। ज्यादातर प्लॉट छोटे थे, 55-60 गज के आसपास। नियम साफ था, जमीन के ऊपर ज्यादा से ज्यादा एक मंजिल। DDA ने तैयार नक्शा तक दे दिया।

छात्रों का ठिकाना । 1973 में दिल्ली विश्वविद्यालय का साउथ कैंपस खुला। रिंग रोड और सैन मार्टिन मार्ग के पार श्री वेंकटेश्वर, जीसस एंड मैरी, आत्मा राम सनातन धर्म, मैत्रेयी, मोतीलाल नेहरू जैसे कॉलेज खड़े हो गए। छात्रों के मुकाबले हॉस्टल हमेशा कम रहे। बाहर से आने वाले छात्र कैंपस से निकलते ही सत्य निकेतन में ठहरने लगे। पहले कमरे किराए पर दिए गए। फिर चारपाई बढ़ी, साझा बाथरूम बने, ऊपर मंजिल चढ़ी। पीजी का साम्राज्य यहीं से फैला।

मनमानी की छूट । 25 साल पहले यहां घर ही घर थे, पीजी मुश्किल से गिने जा सकते थे। अब मूल परिवार अंगुलियों पर हैं, ज्यादातर ने अपने प्लॉट बेच दिए या किराये पर दे दिए। साल 2011-12 में एक और मोड़ आया। करीब 45 पुनर्वास कॉलोनियों में लीज को फ्रीहोल्ड करने की छूट मिली। सत्य निकेतन भी उसी सूची में था। सर्किल रेट का हिस्सा देकर मालिकाना पक्का हो गया। इससे प्लॉट बेचना, कर्ज लेना, नई मंजिल बनाना - सब आसान हो गया। नियम पीछे छूट गए। मंजूर ऊंचाई कम थी, पर इमारतें पांच-छह मंजिल तक खड़ी हो गईं, जबकि पुरानी नींव उसके लिए नहीं बनी थी। 2022 में भी यहां हादसा हुआ था, पर इस बार आपदा बड़ी आई।