Ais Growing Danger Is It A Halahal Poison That Needs To Be Stopped
AI को लेकर यह डर कितना सही
नवभारतटाइम्स.कॉम•
भारतीय महाकाव्यों में समुद्र मंथन की कथा है। जब यह पता चला कि समुद्र को मथने से अमृत निकलेगा तो देवता और असुर दुश्मनी भुलाकर साथ आ गए। अमृत तो निकला, पर उससे पहले आया हलाहल विष। इससे त्राहि मच गई और आखिर में भगवान शिव को स्वयं नीलकंठ बनना पड़ा। कुछ यही हाल है इस समय AI का। OpenAI से लेकर Meta और Amazon तक - हर बड़ी कंपनी आर्टिफिशल इंटेलिजेंस को मथने में लगी थी, जबकि यह चेतावनी लगातार दी गई कि अनियंत्रित AI बनाने वालों पर पलटवार भी कर सकती है।
हड़बड़ी मची । कंपनियों ने पहले हर चेतावनी नजरअंदाज की, लेकिन अब सभी के होश उड़े हैं। कुछ हफ्ते पहले तक बिना हिचक अरबों डॉलर का निवेश करने वाली कंपनियां कह रही हैं कि AI की बढ़ती गति को धीमा करना चाहिए। सैम अल्टमैन, इलॉन मस्क और Dario Amodei जैसे दिग्गजों का मानना है कि AI पर नियंत्रण होना चाहिए, इस पर कड़ी नजर रखी जाए।खतरनाक पहलू । इस हृदय परिवर्तन का कारण है अनियंत्रित AI का बढ़ता खतरा, जिसे कुछ दिनों पहले Anthropic के रिसर्चर Jason Cox ने इस्तीफा देते हुए एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर उजागर किया था। असल में AI का खतरनाक चेहरा इस जुलाई में सामने आया, जब कई AI agents ने Hugging Face नाम के एक प्लैटफॉर्म पर अचानक धावा बोल दिया। इन AI एजेंट्स ने सुरक्षा के कई प्रोटोकॉल तोड़ते हुए ऐसे काम किए, जिनसे साबित हुआ कि AI उत्पात मचा सकती है। अगर ऐसा कोई एजेंट हमला बैंक या अस्पताल पर होता, तो जान-माल का भयंकर नुकसान हो सकता था।
िवशेषज्ञों की चेतावनी । कई जानकारों का मानना है कि अगर समय रहते उचित कदम नहीं उठाए गए, तो AI एजेंट्स पूरे इंटरनेट पर अपना कब्जा जमा सकते हैं। मशीन के सोचने का तरीका इंसानों से काफी अलग है और हाल के दिनों में वह खुद सोचने और फैसले लेने में भी सक्षम हुई है। साथ ही उसमें संवेदनशीलता न के बराबर है, इसलिए वह क्या कहर ढा सकती है, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। आखिर दुनिया की लगभग सारी अहम जानकारी, लोगों के ईमेल से लेकर सरकारी दस्तावेज और बड़ी मात्रा में धन तक, ऑनलाइन उपलब्ध है।
राजनीतिक दखल । AI की इसी उत्पात मचाने की क्षमता को देखते हुए इंडस्ट्री के दिग्गजों ने नियंत्रण रखने की मांग की है। लेकिन, उनकी इस मांग से कई लोग सहमत नहीं हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने साफ कह दिया है कि AI एक रेस की तरह है और अगर अमेरिका इसमें थम गया, तो चीन उससे आगे निकल जाएगा। चीन भी AI की विकास गति कम करने के पक्ष में नहीं। उल्टा, वह इसे पश्चिमी देशों की ऐसी साजिश बता रहा है, जिसका मकसद चीन को AI में आगे बढ़ने से रोकना है।
चाल की आशंका । ध्यान देने वाली बात यह है कि नियंत्रण की मांग मुख्य रूप से पश्चिमी देशों की कंपनियों की ओर से ही आई है। AI का विकास अब तक बहुत कम रेगुलेशन के बीच हुआ है। ऐसे में संभव है कि कुछ कंपनियां नियंत्रण की इस मांग को बड़ी कंपनियों की चाल मानें। AI ऐसा क्षेत्र है, जिसमें रुकना या पीछे हटना सीधे प्रतिस्पर्धियों को आगे निकलने का मौका देना है।
जटिल स्थिति । कुछ मायनों में यह शीत युद्ध जैसा है, जब दोनों गुटों को परमाणु हथियारों के खतरों का पता था, लेकिन कोई भी पीछे हटने को तैयार नहीं था। तब तकनीक पर सरकारों का सीधा नियंत्रण था, जबकि AI के मामले में दुनिया की सबसे ताकतवर तकनीकें कुछ निजी कंपनियों के पास हैं। और इसी से यह मामला और भी जटिल हो जाता है। आम तौर पर कंपनियां सरकारों से कम नियंत्रण की मांग करती हैं, लेकिन यहां तस्वीर उलट गई है।
भरोसे की जरूरत । AI के खतरनाक होने की आशंका से कोई इनकार नहीं कर रहा, लेकिन कंपनियों और सरकारों के बीच भरोसे की कमी के कारण इसके नियंत्रण के तरीकों पर सहमति नहीं बन पा रही। शीत युद्ध का अंत भी आपसी विश्वास से हुआ था। AI की दुनिया को भी आज इसी भरोसे की जरूरत है। मंथन शुरू हो चुका है और हलाहल निकलने लगा है। समय रहते नहीं रोका गया, तो इसे पीने वाला शायद कोई नहीं मिलेगा।