मायावती को यह मौक़ा छोड़ना नहीं चाहिए

नवभारतटाइम्स.कॉम
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पूनम पाण्डे

मायावती के सामने इस वक्त सिर्फ बहुजन समाज पार्टी ( BSP ) को अगले चुनाव में मजबूत करने की चुनौती ही नहीं है, यह भी तय करने का मौका है कि उनकी राजनीतिक विरासत आगे कैसे चलेगी। कांशीराम के बाद अपने दम पर पार्टी को खड़ा किया और यूपी की राजनीति में मजबूत ताकत बनीं। लेकिन, अब सवाल है कि उनके बाद BSP की कमान कौन संभालेगा और क्या वह व्यक्ति परिवार से ही होगा? जिस तरह उत्तराधिकारी को लेकर मायावती खुद कंफ्यूजन में दिख रही हैं, उससे पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच भी दुविधा पैदा हो रही है।
वह कभी अपने भतीजे आकाश आनंद को आगे बढ़ाती हैं और फिर उनसे दूरी बना लेती हैं। आकाश को अब पार्टी से अलग किया जा चुका है। मायावती ने अपनी भतीजी दीपिका आनंद का नाम आगे किया है। सवाल है कि क्या BSP का भविष्य सिर्फ परिवार के भीतर ही तलाशा जाएगा? मायावती परिवारवाद से दूरी की बात जरूर करती हैं, लेकिन उत्तराधिकारी वह परिवार में ही ढूंढती दिखती हैं।

कांशीराम की राजनीतिक विरासत

मायावती के लिए शायद यह सही वक्त है कि वह उत्तराधिकारी चुनने की पूरी प्रक्रिया को परिवार से बाहर भी देखें। कांशीराम ने मायावती की नेतृत्व क्षमता देखकर उन्हें आगे बढ़ाया था। मायावती भी अगर अपने आसपास किसी ऐसे कार्यकर्ता को देखती हैं, तो उसे आगे बढ़ाने में हिचक क्यों? यह इसलिए भी अहम है क्योंकि BSP को कांशीराम ने सामाजिक आंदोलन से राजनीतिक ताकत में बदला और मायावती ने इसे यूपी की सत्ता तक पहुंचाया। ऐसे में अगर अगली पीढ़ी का नेतृत्व तय करने में परिवार ही कसौटी बन जाए तो यह कांशीराम की बनाई राजनीतिक संस्कृति से अलग रास्ता होगा।

परिवार से कोई योग्य नेता हो सकता है, लेकिन सिर्फ परिवार में होना ही योग्यता का विकल्प नहीं हो सकता। अगर मायावती को परिवार से बाहर ऐसा कोई कार्यकर्ता दिखाई ही नहीं देता, जिसे वह पार्टी की कमान सौंप सकें तो यह उससे भी ज्यादा गंभीर सवाल है। इतने लंबे वक्त में अगर पार्टी में दूसरी कतार का नेतृत्व तैयार नहीं हो पाया तो इसका मतलब है कि समस्या सिर्फ उत्तराधिकारी की नहीं है। संगठन के भीतर नेतृत्व तैयार करने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठता है।

कमजोर होता आधार

BSP के लिए यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि उसका राजनीतिक आधार काफी कमजोर हुआ है। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी को 12.88% वोट मिले और सीट सिर्फ एक। 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का वोट शेयर और घटकर करीब 9% रह गया। सीट एक भी नहीं जीत सकी।

यूपी में दलित आबादी करीब 21% है। इसमें जाटव समुदाय की हिस्सेदारी आधे से ज्यादा है। जाटव समाज लंबे समय तक BSP का सबसे मजबूत आधार रहा है। मायावती खुद भी जाटव समुदाय से आती हैं। लेकिन, अब सवाल यह है कि क्या यह वोट बैंक पहले की तरह ही BSP के साथ रहेगा? चंद्रशेखर आजाद का उभार भी इसमें अहम भूमिका निभा सकता है। वह भी जाटव समुदाय से आते हैं और खास तौर पर युवाओं के बीच उनकी राजनीतिक मौजूदगी बढ़ी है। 2024 में नगीना लोकसभा सीट से उनकी जीत ने दिखाया कि BSP के पारंपरिक सामाजिक आधार में किसी दूसरे दल के लिए राजनीतिक जगह बन सकती है।