मुग़ल कमज़ोर हुए तो शुरू हुई नवाबी

नवभारतटाइम्स.कॉम
mughal weakened nawabi began the story of saadat ali khan
18वीं शताब्दी में मुगल सल्तनत का सूरज डूबने लगा तो उसका सूबा-ए-अवध इस पुरानी कहावत को चरितार्थ करने लगा कि 'जब भी दिल्ली कमजोर होती है, मनसबदार सिर उठाने लगते हैं।' जगह-जगह राजा और जमींदार मुगलों की प्रभुसत्ता को आंख दिखाने लगे। कुछ तो बगावत पर आमादा हो गए।

रंगीला के करीबी । 1722 आते-आते हालात इतने बिगड़े कि मुगल बादशाह मुहम्मदशाह 'रंगीला' को आगरा के अपने सूबेदार सआदत अली खां को अवध का सूबेदार बनाना पड़ा। सआदत ने सूबे के राजाओं और जमींदारों की मनमानियों पर काबू कर अपना इकबाल तो बुलंद किया ही, जल्द ही नवाबी की नींव भी डाल दी। इतिहासकार बताते हैं कि सआदत कभी परिस्थितियों से हार नहीं मानते थे। यह आदत लखनऊ में बहुत काम आई।
इराक में जन्म । सआदत उनका नाम नहीं, 'रंगीला' द्वारा उनकी बहादुरी के एवज में दी गई उपाधि थी। वैसे ही जैसे बुरहान-उल-मुल्क यानी देश की पहचान। इनमें पहली उपाधि एक नाजुक घड़ी में रंगीला की जान बचाने का इनाम थी। नाम तो उनका मोहम्मद अमीन खां था, जो इराक के नैशापुर में जन्म के बाद मां-बाप ने रखा था।

दरबार में दाखिला । बड़े हुए तो दुश्वारियां भी बढ़ गईं। रोजी-रोटी का कोई ठीक-ठाक जरिया न होने के कारण बीवी से रोज चख-चख हुआ करती। एक दिन तंग आकर उन्होंने अपना घर तो क्या, देश भी छोड़ दिया और भारत आकर गुजरात के सूबेदार की नौकरी कर ली। वहां भी मन नहीं रमा तो दिल्ली चले आए और मुगल दरबार में 'किंगमेकर' जैसी हनक रखने वाले सैय्यद बंधुओं की सिफारिश पर बादशाह फर्रुखसियर से उनकी सेना में एक प्रभावशाली नौकरी प्राप्त कर ली।

सत्ता में बदलाव । इसके आगे का रास्ता उन्होंने अपनी बहादुरी और सूझबूझ से ही तय किया। सैन्य संगठन में उनकी दक्षता और वफादारी ने उन्हें फर्रुखसियर का नूर-ए-नजर बना दिया। लेकिन, 9 अप्रैल 1719 को सैय्यद बंधु किसी बात पर फर्रुखसियर से नाराज हो गए और मराठों से मिलकर उनकी हत्या करवा दी। फिर अपने प्रभुत्व से एक के बाद एक दो कठपुतली मुगल बादशाहों की ताजपोशी कराई। उन दोनों में कोई भी लंबी उम्र नहीं पा सका तो 'रंगीला' को गद्दी पर बैठाया।

जानलेवा गलती । खैर, अवध पहुंच कर सआदत की महत्वाकांक्षाएं जाग उठीं। उन्होंने आगरा और अवध, दोनों की सूबेदारी चाही। रंगीला आड़े आए, पर सआदत ने बादशाह की कमजोरियों का फायदा उठाया। वह अवध के सूबेदार से नवाब बन गए और फिर उसे दिल्ली के दबदबे से आजाद भी कर दिया। लेकिन, 1739 में रंगीला को विश्वास में लिए बिना करनाल के मोर्चे पर सिर्फ अपनी सेना के दम पर नादिरशाह को रोकने जा पहुंचना उन पर बहुत भारी पड़ा। वह बुरी तरह हारे, कैद कर लिए गए और कैद में ही आत्महत्या करने को मजबूर हुए।