सचमुच के फूफा!

नवभारतटाइम्स.कॉम
real fufa heavy displeasure over the use of the word fufa in politics
नाराज हो गए हैं सचमुच के फूफा , बहुत ज्यादा नाराज। भारी गुस्से में हैं। हद ही हो गई यार कि जिसे देखो, वही बिना बात ‘फूफा-फूफा’ कहे जा रहा है। फूफा शब्द कोई ‘फुकरा’ थोड़े ही है कि कोई भी और कहीं भी पुकारना शुरू कर दे। इस शब्द की गरिमा है। अपनी इज्जत है। लेकिन, इधर तो इज्जत का फालूदा बना कर रख दिया है। फूफा जी याद कर रहे हैं कि पहले तो उन्हें सिर्फ रिश्तेदार ही फूफा कहते थे। फिर पास-पड़ोस के लोगों ने फूफा कहना शुरू किया। इसके बाद तो बिल्डिंग भर के लोग फूफा कहने लगे। इधर पता नहीं ऐसा क्या हो गया है कि शहर भर के मुंह से फूफा निकल रहा है। जहां देखो, वहां फूफा। अखबारों में फूफा। चैनलों में फूफा। सोशल मीडिया में फूफा। कुल मिलाकर हर कहीं ही है ‘फूफा-फूफा’।

फूफा जी को लग रहा है कि यह उन्हें मानसिक त्रास देने का एक षड्यंत्र है। मारे जलन के लोग उन्हें खुश नहीं देख सकते। वह उम्र के जिस पड़ाव पर पहुंच चुके हैं, उन्हें शांति से जीने देना चाहिए। लेकिन, लोग हैं कि बेमतलब ही फूफा-फूफा कह उनका जी फूंक रहे हैं।
फूफा जी याद कर रहे हैं कि वह आखिरी बार कब बाराती बने थे और किस शादी में गए थे? किसकी शादी में उन्होंने आखिर किस बात पर मुंह फुला दिया था? फूला हुआ उनका मुंह आखिर कब तक फूला ही रहा था? फूफा जी को कुछ भी याद नहीं आ रहा। अंत में उन्हें बहुत दुखी स्वर में कहना पड़ा, ‘दुश्मनी जम कर करो, लेकिन ये गुंजाइश रहे जब कभी किसी के फूफा बन जाएं, तो शर्मिंदा न हों।’ आशय यही कि जम कर पॉलिटिक्स करो। जी भरकर करो, लेकिन फूफा तक तो बात कतई मत पहुंचाओ।