दूसरों का दर्द ख़ुद महसूस हो, यह प्रेम का असर है

Contributed byसंजय तेवतिया|नवभारतटाइम्स.कॉम
love the power to feel others pain and the sadhana of life
प्रेम संसार की सबसे पवित्र और शक्तिशाली संपदा है। सच्चा प्रेम हृदय को इतना निर्मल बना देता है कि उसमें द्वेष, ईर्ष्या, घृणा और किसी के अहित की भावना टिक नहीं पाती। इसलिए प्रेम कभी किसी का अहित नहीं होने देता। जब हृदय में प्रेम जागता है, तो विचारों में करुणा और व्यवहार में मधुरता आ जाती है। मनुष्य दूसरों को चोट पहुंचाने से पहले उनके दर्द को महसूस करने लगता है। जब हमें यह बोध होने लगता है कि प्रत्येक जीव में उसी परम चेतना का अंश है, तब दूसरे को नुकसान पहुंचाना स्वयं को चोट पहुंचाने जैसा लगता है। इसलिए, हम अनजाने में भी गलतियां करने से बचना चाहते हैं। यह प्रेम की आध्यात्मिक पहुंच है।

सच्चा प्रेम निष्काम होता है। इसमें पाने की इच्छा कम और देने की भावना बढ़ जाती है। मां का बच्चे के प्रति प्रेम, संत का समस्त जीवों के प्रति प्रेम और ईश्वर का अपनी सृष्टि के प्रति प्रेम इसके उदाहरण हैं। ऐसा प्रेम बदले में कुछ नहीं मांगता। सच्चा प्रेम क्रोध की जगह क्षमा, घृणा की जगह करुणा और अहंकार की जगह विनम्रता लाता है। इसका अर्थ यह नहीं कि प्रेम गलत का विरोध करना छोड़ देता है। प्रेम अन्याय का प्रतिकार करता है, लेकिन घृणा को अपने भीतर जगह नहीं देता।
जीवन में जब कोई हमारे साथ अन्याय करता है, तब बदला लेने की भावना जगती है। लेकिन, प्रेम हमें सिखाता है कि प्रतिशोध के स्थान पर क्षमा करना स्वयं को भीतर से मुक्त करना है। ईश्वर के प्रति प्रेम भी हमें हर जीव में उसी परम सत्ता का दर्शन करना सिखाता है। भूखे को भोजन देना, दुखी को सांत्वना देना, कमजोर की सहायता करना और प्रकृति की रक्षा करना भी ईश्वर की सेवा है। किसी के अंधकारमय जीवन में आशा का दीप जलाना भी उतना ही पवित्र है, जितना मंदिर में दीप जलाना।

इसलिए प्रेम को जीवन की साधना बनाना सुखकर है। मधुर वचन, सहायता, क्षमा, दया, शुभकामनाएं- ये प्रेम के सरल रूप हैं। प्रेम बांटने से बढ़ता है। जहां सच्चा प्रेम होता है, वहां किसी के अहित की इच्छा नहीं, बल्कि सबके कल्याण की कामना जन्म लेती है। प्रेम रिश्तों को ही नहीं, आत्माओं को भी जोड़ता है।