भाषा से समृद्धि

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dinkars powerful speech give hindi opportunity only then will it be prosperous
तब भारत स्वतंत्र हो चुका था और देश में भाषा को लेकर गहन बहस चल रही थी। संसद में कई सदस्य अंग्रेजी शब्दों का अधिक प्रयोग करते थे। उनका तर्क था कि हिंदी में प्रशासनिक और तकनीकी शब्दों का अभाव है, इसलिए अंग्रेजी के बिना काम चलाना कठिन है। उस समय राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर राज्यसभा के सांसद थे। एक दिन भाषा नीति पर संसद में चर्चा हो रही थी। कुछ सदस्यों का कहना था कि हिंदी अभी इतनी समृद्ध नहीं है कि उसे देश की भाषा बनाया जा सके, जबकि कुछ लोग उसकी सीमाएं गिना रहे थे। सभी की बातें सुनने के बाद दिनकर जी अपने स्थान से खड़े हुए और ओजस्वी स्वर में बोले, ‘आप जानते हैं कि हिंदी समृद्ध क्यों नहीं लग रही? क्योंकि आपने उसे अवसर ही नहीं दिया। जब तक एक मां अपने बच्चे को जमीन पर चलने की अनुमति नहीं देगी, बच्चा चलना कैसे सीखेगा? आप हिंदी को सिंहासन से दूर रखकर उसके समृद्ध होने का इंतजार नहीं कर सकते। हिंदी इतनी सक्षम है कि वह देश के जनमानस को एक सूत्र में पिरो सकती है। भाषा तभी समृद्ध होती है, जब वह अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचती है।’ उनकी स्पष्टवादिता ने सदन में नई ऊर्जा भर दी और पूरा संसद भवन तालियों से गूंज उठा।