ममता की मुश्किल

नवभारतटाइम्स.कॉम
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ममता बनर्जी ने 28 साल पहले तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की थी। तब से अभी तक वही TMC का सर्वमान्य चेहरा रहीं। उन्हीं के नेतृत्व में पार्टी ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट की 34 साल पुरानी सरकार को हराया और फिर 15 बरस लगातार शासन किया। अब उसी पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न का इस्तेमाल वह नहीं कर सकेंगी। चुनाव आयोग का यह आदेश अंतरिम है, लेकिन राज्य और उसके बाहर भी इसका असर बहुत गहरा हो सकता है।

एकजुट रखना मुश्किल । इस साल बंगाल विधानसभा चुनावों में मिली हार के बाद से ही ममता बनर्जी राजनीतिक मुश्किलों में घिरी हुई हैं। जून में उनके 80 में से लगभग 60 विधायकों ने बगावत कर दी थी। बागी गुट के ही ऋतब्रत को नेता प्रतिपक्ष चुन लिया गया। बाद में पार्टी के 20 सांसद भी अलग हो गए। तब यही माना जा रहा था कि 15 साल सरकार में रही पार्टी के लिए इस मुश्किल दौर में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को एकजुट रखना कठिन होगा, खासकर जो सत्ता मिलने के बाद आए थे। अगर ममता बनर्जी के हाथ से पार्टी का मूल नाम और चुनाव चिह्न निकलता है, तो उनके लिए परेशानियां और बढ़ सकती हैं। इसका संकेत है नंदीग्राम उपचुनाव में ममता गुट की उम्मीदवार का आखिरी मौके पर पर्चा वापस लेना।
पुराने विवाद । पार्टी में टूट के बाद चुनाव चिह्न पर विवाद नया नहीं है। हालिया वक्त में शिवसेना और एनसीपी में यही मसला खड़ा हो चुका है। वहां बागी गुटों को मान्यता मिल गई। इन मामलों में आयोग ने पार्टी संगठन और निर्वाचित प्रतिनिधियों के समर्थन समेत कई कसौटियों पर विचार किया था। बंगाल में चूंकि अभी उपचुनाव हैं, इसलिए आयोग ने अंतरिम व्यवस्था की है। हालांकि इस फैसले पर ममता बनर्जी और विपक्ष, दोनों ही सवाल उठा रहे हैं।

आयोग की जिम्मेदारी । चुनाव आयोग के साथ विपक्ष का रिश्ता इस समय सबसे निचले स्तर पर है। ईवीएम, स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR समेत ऐसे कई मुद्दे हैं, जहां विपक्ष ने खुलकर असंतोष जताया है। ऐसे में यह जिम्मेदारी आयोग पर है कि वह निर्णय के पीछे की प्रक्रिया और कारणों को पारदर्शी तरीके से सामने रखे। शंका की थोड़ी भी गुंजाइश उसके प्रति भरोसे को कम करेगी।

विपक्षी एकता । ममता के साथ विपक्ष एक दिख रहा है। उन्होंने भी अपने उम्मीदवार के हटने के बाद कांग्रेस को समर्थन देने का ऐलान किया है। विधानसभा चुनाव में TMC और कांग्रेस आमने-सामने थीं। ऐसे में मौजूदा प्रकरण दोनों को फिर एक मंच पर ला सकता है और विपक्षी एकता को नई दिशा दे सकता है।