आज राष्ट्रवाद से ज्यादा देशभक्ति चाहिए

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प्रफेसर सैयद इरफान हबीब राजनीतिक इतिहासकार हैं। हिस्टोरियन ध्रुव रैना के साथ मिलकर उन्होंने लिखा, 'Domesticating Modern Science', जिसे बेहद चर्चा मिली। शहीद भगत सिंह और मौलाना आजाद पर भी उन्होंने किताबें लिखी हैं। संविधान पर आधारित बुक सीरीज के तहत उनकी एक और किताब 'Scientific Temper and Constitution' जल्द आने वाली है। आजादी के आठ दशकों में आए बदलावों और आगे की चुनौतियों पर उनसे बात की दिलीप लाल ने। पेश हैं मुख्य अंश :

n आजाद भारत की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक उपलब्धि क्या रही है?
मेरे हिसाब से हमारे देश में 80 बरसों में लोकतांत्रिक परंपराओं को जो मजबूती मिली है, वही सबसे बड़ी उपलब्धि है। प्रश्न यह है कि उस उपलब्धि को हमने कहां तक संभाल कर रखा? पिछले कुछ बरसों में इसमें कुछ कमजोरी आई है। प्रजातंत्र के ढांचे में कमियां आई हैं, जैसे मीडिया की वह भूमिका नहीं रही। न्यायपालिका और अन्य संस्थानों में भी कुछ न कुछ कमजोरी देखने को मिल रही है। पहले भी ऐसे चैलेंजेज आए, लेकिन हमने बड़ी मजबूती से उनका सामना किया।

n वो कौन-सी कमियां हैं, जिन्हें हम इतने बरसों बाद भी पूरा नहीं कर पाए?

आज बहुत सारे मुद्दे उठाए जा रहे हैं, Gen Z की बात हो रही है, शिक्षा से जुड़ मसले हैं। स्कूल एजुकेशन बहुत बड़ा मुद्दा है। हम इसमें कमजोर रहे हैं। इसकी शुरुआत आजादी के बाद से ही हो गई थी। मैं ब्लेम नहीं करता, लेकिन हमारी पहली सरकार के सामने चैलेंज यह था कि गरीबी कैसे दूर की जाए? नेहरू के सामने चुनौती थी भारत को बाकी देशों के मुकाबले खड़ा करने की। साइंस, हायर एजुकेशन की बात तो हो गई। IIT और दूसरे बड़े संस्थान बने। इनकी जरूरत थी, लेकिन स्कूल एजुकेशन पर उतना काम नहीं हुआ, जितना होना चाहिए था।

n आंदोलन या असहमति पर सरकार का रवैया कैसा होना चाहिए?

जनता की आवाज को सुनना सरकार की जिम्मेदारी है। और यह सरकार के ही हित में है। यही आवाज बताती है कि कहां क्या कमी रह गई। लेकिन, यह कहना कि राजनीति हो रही है, तो डेमोक्रेसी में हर चीज राजनीति है। लोकतंत्र तो राजनीति से ही चलता है। आवाज उठाना जनता का अधिकार है और सरकार का फर्ज है कि उन आवाजों को सुने और बातचीत करे।

n कहा जाता है कि राष्ट्रवाद और देशभक्ति एक-दूसरे के पूरक हैं...।

राष्ट्रवाद और देशभक्ति में लोग अक्सर कंफ्यूज करते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन में राष्ट्रवाद की बात थी, क्योंकि बाहरी दुश्मन से हमें लड़ाई लड़नी थी। उस राष्ट्रवाद को हमने परिभाषित किया, जो समावेशी था। आजाद होने के बाद बारी आती है देशभक्ति की। देश के लिए काम कीजिए, चाहे वह शिक्षा को लेकर हो, औद्योगीकरण को लेकर हो या और सामाजिक मुद्दों को लेकर। आज राष्ट्रवाद से ज्यादा जरूरत है देशभक्ति की। राष्ट्रवाद वहां आएगा, जहां चीन हमारी सीमा पर दबाव डाल रहा है।

n इतिहास के राजनीतिक इस्तेमाल का हमेशा सवाल उठता है। इस पर एक इतिहासकार क्या कहता है?

दुख की बात यह है कि आज जिस तरह इतिहास को परिभाषित किया जा रहा है, इतिहास में उसको हम presentism कहते हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में कल को देखने की कोशिश। कुछ लोगों ने बिलकुल अतीत में ही जीना शुरू कर दिया है। इतिहास में तो बहुत ऐसी चीजें हुई ही नहीं, जो आप देखना चाहते हैं। कुछ लोग ऐसा इतिहास गढ़ रहे हैं, जो हमारा आज तो खराब करेगा ही, हमारे बच्चे का भविष्य भी खराब करेगा। मैं यह कहना चाहता हूं कि इतिहास में बहुत-सी ऐसी चीजें हैं, जिससे सबक लेने की जरूरत है। आप इतिहास में जाकर रह नहीं सकते, उससे सीख सकते हैं।