'बारिश' के बीच 'मॉनसून' का जश्न

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nNBT न्यूज, लखनऊ

रिमझिम फुहारों के बाच शहर की शाम शुक्रवार को संगीत, साहित्य और कला के रंगों से सराबोर हो उठी। बाहर आसमान से बरसती बूंदें और हज़रतगंज के होटल के भीतर गूंजते सुरमयी साज़, दोनों ने मिलकर शहर-ए-अदब को मानसून के एक अलौकिक उत्सव में डुबो दिया। मौका था एक्सक्यूरेटर्स इवेंट्स द्वारा आयोजित 'बारिश-आर्ट म्यूजिक मानसून' के लखनऊ संस्करण का, जहां अवध की तहज़ीब, नफासत और सांस्कृतिक विरासत का अद्भुत संगम देखने को मिला।
दिल्ली और जयपुर के बाद लखनऊ पहुंचे इस उत्सव ने मौसम को केवल एक ऋतु के रूप में नहीं, बल्कि स्मृतियों, मोहब्बत और कलात्मक अहसास के रूप में जीवंत कर दिया।

प्रस्तुतियों का संगीतमय सफर

शाम का आगाज़ अस्करी नकवी की भावपूर्ण संगीतमय प्रस्तुति 'मेघा रे' से हुआ। इस प्रस्तुति ने श्रोताओं को मानसून के आत्मीय और संवेदनशील मूड से गहराई से जोड़ दिया। वहीं साहित्य और सिनेमा के संगम को पटल पर लाते हुए साहित्यकार यतीन्द्र मिश्र ने दर्शकों को सुरों की एक यादगार यात्रा कराई। 'ओ सजना बरखा बहार आई' से लेकर 'अब के सावन घर आजा' जैसी ठुमरी, कजरी, शास्त्रीय और लोक संगीत की सदाबहार रचनाओं के माध्यम से उन्होंने बनारस और लखनऊ की समृद्ध संगीतमय परंपरा को जीवंत किया।

कुटले खान प्रोजेक्ट का लोक व सूफी रंग : शाम अपने संगीतमय चरम पर तब पहुंची, जब कुटले खान प्रोजेक्ट ने मंच संभाला। राजस्थानी लोक संगीत की मिट्टी की महक, सूफी गायकी की आध्यात्मिक गहराई और समकालीन धुनों का समागम देखते ही बन रहा था। 'केसरिया बालम' से शुरुआत कर उन्होंने 'छाप तिलक', 'झूले झूले लाल', 'घूमर', 'सजदा' और 'दमा दम मस्त कलंदर' जैसे गीतों से पूरे हॉल को झूमने पर मजबूर कर दिया।

मंच से परे 'बारिश बाज़ार' की रौनक: संगीतमय मंच के साथ-साथ 'बारिश बाज़ार' ने भी दर्शकों का ध्यान आकर्षित किया। स्थानीय कारीगरों, डिज़ाइनरों और लाइफस्टाइल ब्रांड्स के हस्तशिल्प, सुगंधों, वस्त्रों और लज़ीज़ व्यंजनों के स्टॉल्स ने अवध की मेहमाननवाज़ी और कलात्मकता का बेहतरीन नज़ारा पेश किया।

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