कैंसर कीमोथेरेपी को असरदार बनाने की नई तकनीक: आंतों के बैक्टीरिया में बदलाव से ट्यूमर तक पहुंचेगी ज्यादा दवा
कैंसर कीमोथेरेपी को असरदार बनाने की नई तकनीक: आंतों के बैक्टीरिया में बदलाव से ट्यूमर तक पहुंचेगी ज्यादा दवा
NewsPoint•
नई दिल्ली, 4 अगस्त (आईएएनएस)। वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई तकनीक विकसित की है, जो कीमोथेरेपी की दवाओं को ट्यूमर तक ज्यादा प्रभावी ढंग से पहुंचाने में मदद करती है। यह तकनीक शरीर में मौजूद आंतों के बैक्टीरिया, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहा जाता है, में बदलाव करके काम करती है। इस महत्वपूर्ण शोध को प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मैटेरियल्स में प्रकाशित किया गया है।
आजकल कई तरह के कैंसर के इलाज में नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी का इस्तेमाल होता है। इसमें दवा को बहुत छोटे कणों में पैक करके शरीर में भेजा जाता है, ताकि वह सीधे कैंसर वाली जगह यानी ट्यूमर तक पहुंच सके। लेकिन एक बड़ी समस्या यह है कि दवा का एक बड़ा हिस्सा ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही लिवर द्वारा साफ कर दिया जाता है। लिवर में मौजूद खास प्रतिरक्षा कोशिकाएं, जिन्हें कुप्फर सेल्स कहते हैं, इन दवा कणों को खून से बहुत तेजी से हटा देती हैं। इसका नतीजा यह होता है कि मरीज को दी गई दवा का पूरा फायदा नहीं मिल पाता।शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में पाया कि इस पूरी प्रक्रिया में हमारी आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया की भी अहम भूमिका होती है। ये बैक्टीरिया बाइल एसिड नाम का एक रसायन बनाते हैं। यह बाइल एसिड लिवर की कोशिकाओं को एक तरह का संकेत भेजता है, जिससे वे यह तय करती हैं कि दवा को कितनी तेजी से साफ करना है।
इस समस्या को दूर करने के लिए, वैज्ञानिकों ने एक सामान्य एंटीबायोटिक, जिसका नाम मेट्रोनिडाजोल है, का सीमित समय के लिए इस्तेमाल किया। इस एंटीबायोटिक ने कुछ खास तरह के आंतों के बैक्टीरिया की संख्या को कम कर दिया। इसके परिणामस्वरूप, बाइल एसिड का स्तर भी घट गया। जब बाइल एसिड का स्तर कम हुआ, तो लिवर की कुप्फर कोशिकाएं कम सक्रिय हो गईं। उन्होंने दवा कणों को पहले की तुलना में बहुत कम मात्रा में हटाया।
इसका सीधा फायदा यह हुआ कि कीमोथेरेपी की दवा शरीर में लगभग दोगुनी देर तक बनी रही। जब दवा ज्यादा समय तक शरीर में रहेगी, तो वह निश्चित रूप से ज्यादा मात्रा में ट्यूमर तक पहुंचेगी। शोधकर्ताओं ने पाया कि इससे ट्यूमर की वृद्धि धीमी हुई और कई तरह के कैंसर के प्रीक्लिनिकल मॉडल (जानवरों पर किए गए शुरुआती परीक्षण) में मरीजों के जीवित रहने की अवधि भी बढ़ी। यह सकारात्मक असर कोलन कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, मेलानोमा और पैंक्रियाटिक कैंसर जैसे कई कैंसर मॉडलों में देखा गया।
वैज्ञानिकों ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह असर सिर्फ एंटीबायोटिक की वजह से हुआ है या वास्तव में आंतों के बैक्टीरिया में बदलाव की वजह से। इसके लिए उन्होंने फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (एफएमटी) नामक एक तकनीक का प्रयोग किया। इस तकनीक में, जिन जानवरों को एंटीबायोटिक दिया गया था, उनके आंतों के बैक्टीरिया को दूसरे जानवरों में स्थानांतरित किया गया। सबसे खास बात यह रही कि जिन दूसरे जानवरों को कोई एंटीबायोटिक नहीं दिया गया था, उनमें भी वही सकारात्मक परिणाम देखने को मिले। इससे यह साबित हो गया कि असली बदलाव आंतों के माइक्रोबायोम की वजह से हुआ था, न कि दवा के सीधे प्रभाव से।
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज कैंसर के इलाज के बारे में हमारी सोच को पूरी तरह से बदल सकती है। अब तक वैज्ञानिक केवल कीमोथेरेपी की दवा को बेहतर बनाने पर ध्यान केंद्रित कर रहे थे। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि मरीज के शरीर का माइक्रोबायोम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, यह रिसर्च अभी प्रीक्लिनिकल स्तर पर हुई है, जिसका मतलब है कि इसे सीधे इंसानों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, मेट्रोनिडाजोल एक ऐसी दवा है जिसे पहले से ही मंजूरी मिल चुकी है और यह सुरक्षित मानी जाती है। इसलिए, भविष्य में क्लिनिकल ट्रायल (इंसानों पर किए जाने वाले परीक्षण) के जरिए यह देखा जा सकता है कि क्या कम अवधि के लिए इस एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नैनोपार्टिकल आधारित कीमोथेरेपी के साथ करने से मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि आने वाले समय में आंतों के माइक्रोबायोम और बाइल एसिड की जांच करके यह पता लगाना भी संभव हो सकता है कि कौन-से मरीज कीमोथेरेपी से सबसे ज्यादा फायदा उठा सकते हैं। यदि आगे के अध्ययन सफल होते हैं, तो कैंसर का इलाज सिर्फ दवा और ट्यूमर तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि, मरीज के माइक्रोबायोम को ध्यान में रखकर भी उपचार की नई और प्रभावी रणनीतियां तैयार की जा सकेंगी। यह खोज कैंसर के खिलाफ लड़ाई में एक नया अध्याय खोल सकती है।