कैंसर कीमोथेरेपी को असरदार बनाने में आंतों के बैक्टीरिया की भूमिका: नई वैज्ञानिक खोज
कैंसर कीमोथेरेपी को असरदार बनाने में आंतों के बैक्टीरिया की भूमिका: नई वैज्ञानिक खोज
NewsPoint•
वैज्ञानिकों ने कैंसर के इलाज में एक बड़ी कामयाबी हासिल की है। अमेरिका के यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास एमडी एंडरसन कैंसर सेंटर के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी नई तकनीक खोजी है, जिससे कीमोथेरेपी की दवाओं को ट्यूमर तक ज़्यादा असरदार तरीके से पहुंचाया जा सकता है। यह सफलता आंतों में मौजूद बैक्टीरिया, जिन्हें गट माइक्रोबायोम कहते हैं, में बदलाव करके हासिल की गई है। इस अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित जर्नल नेचर मैटेरियल्स में छपे हैं।
आजकल कई तरह के कैंसर के इलाज में नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी का इस्तेमाल होता है। इसमें दवा को बहुत छोटे कणों में पैक करके शरीर में भेजा जाता है, ताकि वह सीधे कैंसर वाली जगह यानी ट्यूमर तक पहुंच सके। लेकिन एक बड़ी दिक्कत यह आती है कि दवा के ये छोटे कण ट्यूमर तक पहुंचने से पहले ही लिवर द्वारा शरीर से बाहर निकाल दिए जाते हैं। लिवर में कुछ खास तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाएं होती हैं, जिन्हें कुप्फर सेल्स कहते हैं। ये कोशिकाएं खून में घूम रहे दवा के कणों को बहुत तेज़ी से पकड़कर साफ कर देती हैं। इस वजह से मरीज को दी गई दवा का पूरा फायदा नहीं मिल पाता और इलाज उतना असरदार नहीं होता जितना होना चाहिए।शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में पाया कि इस प्रक्रिया में हमारी आंतों में रहने वाले बैक्टीरिया का भी अहम रोल होता है। ये बैक्टीरिया बाइल एसिड नाम का एक रसायन बनाते हैं। यह बाइल एसिड लिवर की कोशिकाओं को एक तरह का सिग्नल भेजता है, जिससे वे यह तय करती हैं कि दवा को कितनी जल्दी शरीर से बाहर निकालना है।
इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक सामान्य एंटीबायोटिक, जिसका नाम मेट्रोनिडाजोल है, का सीमित समय के लिए इस्तेमाल किया। इस एंटीबायोटिक ने आंतों में मौजूद कुछ खास तरह के बैक्टीरिया की संख्या कम कर दी। जब बैक्टीरिया कम हुए, तो बाइल एसिड का स्तर भी घट गया। बाइल एसिड कम होने से लिवर की कुप्फर कोशिकाएं कम सक्रिय हो गईं। इसका मतलब है कि वे दवा के कणों को पहले की तुलना में बहुत कम मात्रा में साफ करने लगीं।
इस बदलाव का सीधा फायदा यह हुआ कि कीमोथेरेपी की दवा शरीर में लगभग दोगुने समय तक बनी रही। जब दवा ज़्यादा समय तक शरीर में रहेगी, तो वह ज़्यादा मात्रा में ट्यूमर तक पहुंचेगी। इससे ट्यूमर की बढ़त धीमी हो गई। वैज्ञानिकों ने कई तरह के कैंसर के प्रीक्लिनिकल मॉडल (जानवरों पर किए गए शुरुआती परीक्षण) में देखा कि इस तकनीक से मरीजों के जीवित रहने की अवधि भी बढ़ी। यह असर कोलन कैंसर, ब्रेस्ट कैंसर, मेलानोमा और पैंक्रियाटिक कैंसर जैसे कई कैंसर के मॉडल में देखा गया।
यह जानने के लिए कि यह सकारात्मक असर सिर्फ एंटीबायोटिक की वजह से हुआ है या वाकई गट माइक्रोबायोम में बदलाव की वजह से, वैज्ञानिकों ने एक और प्रयोग किया। उन्होंने फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट (एफएमटी) का इस्तेमाल किया। इसमें, जिन जानवरों को एंटीबायोटिक दी गई थी, उनके आंतों के बैक्टीरिया को दूसरे जानवरों में डाला गया। हैरानी की बात यह रही कि जिन जानवरों में ये बैक्टीरिया डाले गए, उन्हें एंटीबायोटिक नहीं दी गई थी, फिर भी उनमें वही सकारात्मक नतीजे दिखे। इससे यह साबित हो गया कि असली बदलाव आंतों के माइक्रोबायोम की वजह से हुआ था, न कि एंटीबायोटिक दवा के सीधे असर से।
शोधकर्ताओं का मानना है कि यह खोज कैंसर के इलाज के बारे में हमारी सोच को बदल सकती है। अब तक वैज्ञानिक सिर्फ कीमोथेरेपी की दवाओं को बेहतर बनाने पर ध्यान दे रहे थे। लेकिन यह अध्ययन बताता है कि मरीज के शरीर का माइक्रोबायोम भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
फिलहाल, यह रिसर्च अभी प्रीक्लिनिकल स्तर पर है, यानी इसे सीधे इंसानों पर लागू नहीं किया जा सकता। हालांकि, मेट्रोनिडाजोल एक ऐसी दवा है जिसे पहले से ही मंजूरी मिल चुकी है और यह सुरक्षित मानी जाती है। इसलिए, भविष्य में क्लिनिकल ट्रायल (इंसानों पर किए जाने वाले परीक्षण) के जरिए यह देखा जा सकता है कि क्या कम समय के लिए इस एंटीबायोटिक का इस्तेमाल नैनोपार्टिकल-आधारित कीमोथेरेपी के साथ करने से मरीजों को बेहतर परिणाम मिल सकते हैं।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आने वाले समय में गट माइक्रोबायोम और बाइल एसिड की जांच करके यह पता लगाया जा सकेगा कि कौन से मरीज कीमोथेरेपी से सबसे ज़्यादा फायदा उठा सकते हैं। अगर आगे के अध्ययन सफल होते हैं, तो कैंसर का इलाज सिर्फ दवा और ट्यूमर तक सीमित नहीं रहेगा। बल्कि, मरीज के माइक्रोबायोम को ध्यान में रखकर भी इलाज की नई रणनीतियां बनाई जा सकेंगी। यह एक बड़ी उम्मीद है कि हम कैंसर से लड़ने के लिए और भी बेहतर तरीके खोज पाएंगे, जो मरीज के शरीर की प्राकृतिक व्यवस्था का भी ख्याल रखेंगे।