भोटे कोशी बाढ़: जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और जलविद्युत परियोजनाओं पर गंभीर सवाल
भोटे कोशी बाढ़: जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और जलविद्युत परियोजनाओं पर गंभीर सवाल
NewsPoint•
भोटे कोशी-रसुवागढ़ी में आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और नदियों पर बन रहे जलविद्युत ढांचों को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संरक्षणवादी और नदी विशेषज्ञ मेघ आले ने इस आपदा को प्राकृतिक घटनाओं और मानवीय गतिविधियों के मिले-जुले प्रभाव का नतीजा बताया है। उनका कहना है कि हिमालय में बढ़ते खतरों को देखते हुए नेपाल और पूरे क्षेत्र को अपने विकास के तरीके पर फिर से सोचना होगा।
बाढ़ का कारण: प्रकृति और इंसान का मिला-जुला असरमेघ आले ने बताया कि भोटे कोशी-रसुवागढ़ी में आई इस भयानक बाढ़ का मुख्य कारण चीन के तिब्बत क्षेत्र में बर्फ और चट्टानों का एक बड़ा हिस्सा नदी में गिरना था। यह घटना इतनी अचानक हुई कि चीनी अधिकारियों को भी इसे समझने और प्रतिक्रिया देने का मौका नहीं मिला। कुछ ही घंटों में चीन की तरफ भी भारी नुकसान हुआ। भोटे कोशी नदी, जो त्रिशूली नदी प्रणाली का हिस्सा है, तिब्बत जाने वाले राजमार्ग पर रसुवागढ़ी के पास बहती है। यह नदी आगे गोसाईंकुंड क्षेत्र से आने वाली धाराओं से मिलकर त्रिशूली नदी बनाती है। इसलिए, इस क्षेत्र में होने वाली कोई भी बड़ी प्राकृतिक घटना निचले इलाकों तक असर पहुंचा सकती है।
आले ने इस आपदा को सिर्फ एक प्राकृतिक घटना मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने कहा कि यह प्राकृतिक घटनाओं और इंसानी हरकतों का मिला-जुला असर हो सकता है। उनके अनुसार, जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग ने हिमालयी क्षेत्र में खतरे बढ़ा दिए हैं, और इन बदलावों के पीछे इंसानी गतिविधियां भी जिम्मेदार हैं। उन्होंने खास तौर पर त्रिशूली-भोटे कोशी नदी कॉरिडोर में बन रहे बांधों और जलविद्युत परियोजनाओं का जिक्र किया। उनका मानना है कि नदी घाटियों में बड़े पैमाने पर हो रहे निर्माण से प्राकृतिक आपदाओं के समय नुकसान का स्तर बढ़ जाता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि इस घटना को किसी एक परियोजना से जोड़कर नहीं देखना चाहिए, बल्कि इसे व्यापक प्राकृतिक और मानवीय परिस्थितियों के संदर्भ में समझना चाहिए।
वैज्ञानिक जांच और विकास मॉडल पर सवाल
मेघ आले ने कहा कि इस घटना के असली कारणों का पता लगाना बहुत जरूरी है। सबसे पहले यह जानना होगा कि पहाड़ से बर्फ और चट्टानें आखिर गिरीं क्यों। वैज्ञानिकों को यह भी जांचना होगा कि वहां किस तरह की बर्फ या चट्टानें थीं और क्या किसी ग्लेशियर झील (बर्फ से बनी झील) की कोई भूमिका थी। उन्होंने बताया कि वैज्ञानिक अभी इस घटना के कारणों का अध्ययन कर रहे हैं। जब प्राकृतिक खतरे और इंसानी दखलअंदाजी एक साथ आते हैं, तो उसका असर कई गुना बढ़ जाता है। यही वजह है कि हिमालयी क्षेत्र में आपदा के खतरे को समझने के लिए सिर्फ मौसम या भौगोलिक परिस्थितियों का अध्ययन काफी नहीं है, बल्कि विकास की गतिविधियों को भी साथ में देखना होगा।
चेतावनी के संकेत और भविष्य की राह
मेघ आले ने हाल के वर्षों में हिमालयी क्षेत्र में हुई कई घटनाओं का उदाहरण दिया, जैसे उत्तराखंड, तीस्ता और नेपाल के पश्चिमी हिस्से में सेती नदी क्षेत्र में आई आपदाएं। उन्होंने कहा कि ये घटनाएं गंभीर चेतावनी हैं। इन घटनाओं को अलग-अलग नहीं, बल्कि हिमालय में बदलते पर्यावरण और बढ़ते खतरों के संकेत के तौर पर देखा जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अब यह सोचने का समय है कि इन खतरों को कैसे कम किया जाए और विकास की मौजूदा सोच में क्या बदलाव किए जाएं।
उन्होंने हिंदू-कुश हिमालयी क्षेत्र की नदियों को करोड़ों लोगों की जीवनरेखा बताया। उन्होंने कहा कि इन नदियों का महत्व सिर्फ बिजली उत्पादन या आर्थिक संसाधन तक सीमित नहीं है। आले ने कहा कि यह सोचना खतरनाक हो सकता है कि अगर विकास के नाम पर किसी देश की सभ्यता, प्रकृति और संस्कृति को नुकसान पहुंचता है, तो उसे असली विकास कैसे माना जा सकता है। उनका मानना है कि जलविद्युत उत्पादन जरूरी हो सकता है, लेकिन हर नदी और हर संभावित मेगावाट बिजली का दोहन करना विकास का सही तरीका नहीं है।
ग्लोबल वार्मिंग का बढ़ता असर
ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालयी क्षेत्र में बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे ग्लेशियर झीलें बन रही हैं और उनके फटने का खतरा बढ़ रहा है। जब ऐसी झीलें फटती हैं, तो अचानक बाढ़ आ जाती है, जो नीचे के इलाकों में भारी तबाही मचा सकती है। इसके अलावा, ग्लोबल वार्मिंग के कारण मौसम में भी अप्रत्याशित बदलाव आ रहे हैं, जिससे भारी बारिश और भूस्खलन जैसी घटनाएं बढ़ रही हैं।
जलविद्युत परियोजनाओं का प्रभाव
नदियों पर बांध बनाकर बिजली बनाने की परियोजनाओं से भी नदियों के प्राकृतिक बहाव में बदलाव आता है। इससे नदी के किनारों पर कटाव बढ़ सकता है और बाढ़ का खतरा भी बढ़ सकता है। जब ऐसी परियोजनाएं उन इलाकों में बनाई जाती हैं जो पहले से ही भूस्खलन या बाढ़ के प्रति संवेदनशील हैं, तो खतरा और भी बढ़ जाता है। मेघ आले ने इसी ओर इशारा करते हुए कहा कि विकास के नाम पर प्रकृति के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए।
विकास की नई परिभाषा की जरूरत
आले के अनुसार, हिमालयी क्षेत्र में विकास का एक ऐसा मॉडल अपनाने की जरूरत है जो प्रकृति और पर्यावरण का सम्मान करे। इसमें स्थानीय समुदायों की जरूरतों और उनकी पारंपरिक ज्ञान को भी शामिल किया जाना चाहिए। सिर्फ बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के बजाय, ऐसे विकास पर ध्यान देना चाहिए जो टिकाऊ हो और भविष्य की पीढ़ियों के लिए भी सुरक्षित हो। नदियों को सिर्फ बिजली बनाने का जरिया नहीं, बल्कि एक अनमोल प्राकृतिक संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए, जिसकी रक्षा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
भविष्य के लिए सबक
भोटे कोशी-रसुवागढ़ी की घटना एक गंभीर चेतावनी है। यह हमें याद दिलाती है कि प्रकृति के साथ छेड़छाड़ के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। हमें अपने विकास के तरीकों पर पुनर्विचार करना होगा और ऐसे कदम उठाने होंगे जो पर्यावरण के अनुकूल हों। हिमालयी क्षेत्र की नाजुक पारिस्थितिकी को बचाना और वहां रहने वाले लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। अगर हम अभी नहीं चेते, तो भविष्य में ऐसी और भी भयानक आपदाओं का सामना करना पड़ सकता है।