सौरव गांगुली: भारतीय क्रिकेट के 'दादा' का सफर, कप्तानी से बीसीसीआई अध्यक्ष तक

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Navbharat Times
नई दिल्ली, 7 जुलाई: भारतीय क्रिकेट के 'दादा' के नाम से मशहूर सौरव गांगुली, देश के सबसे सफल कप्तानों में से एक रहे हैं। उन्होंने भारतीय टीम में आक्रामक सोच को बढ़ावा दिया और युवा खिलाड़ियों को आगे आने का मौका दिया। बाएं हाथ के इस शानदार बल्लेबाज ने भारत को विदेशों में कई ऐतिहासिक जीतें दिलाईं। संन्यास के बाद, गांगुली ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के अध्यक्ष के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं। 8 जुलाई 1971 को कोलकाता के एक संपन्न परिवार में जन्मे सौरव के पिता चंडीदास गांगुली खुद एक बेहतरीन क्लब क्रिकेटर थे और उनके भाई भी क्रिकेट के शौकीन थे। घर में हमेशा क्रिकेट की बातें होती रहती थीं। परिवार के ज्यादातर सदस्य बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे, इसी वजह से सौरव को भी उल्टे हाथ से खेलने की आदत पड़ गई। उनके बड़े भाई स्नेहाशीष बंगाल की तरफ से क्रिकेट खेलते थे, लेकिन सौरव ने शुरुआत में क्रिकेट की बजाय फुटबॉल को ज्यादा महत्व दिया।

13 साल की उम्र में सौरव गांगुली को एक समर क्रिकेट कैंप में भेजा गया, जहाँ उनकी क्रिकेट में रुचि जगी। बंगाल और ओडिशा के बीच एक अंडर-15 फ्रेंडली मैच में बंगाल की टीम में एक खिलाड़ी की कमी थी। सौरव को मौका मिला और उन्होंने शानदार शतक जड़ दिया। यह शतक उनके क्रिकेट करियर का एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। परिवार ने घर के पास दो कंक्रीट की पिचें बनवाईं, जहाँ सौरव और स्नेहाशीष मिलकर अभ्यास करते थे। दोनों के लिए एक कोच भी नियुक्त किया गया और घर में जिम की भी व्यवस्था की गई।
सौरव गांगुली ने साल 1989 में रणजी ट्रॉफी में अपना डेब्यू किया। घरेलू क्रिकेट में शानदार प्रदर्शन के बाद, आखिरकार गांगुली को साल 1992 में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे मैच में डेब्यू करने का मौका मिला। हालांकि, इस मैच में उनके बल्ले से सिर्फ 3 रन निकले और उन्हें टीम से बाहर कर दिया गया। लगभग चार साल बाद, साल 1996 में, उन्हें टेस्ट क्रिकेट में पदार्पण का मौका मिला। इंग्लैंड के खिलाफ अपनी पहली ही पारी में, उन्होंने 20 चौकों की मदद से 131 रन बनाकर अपनी काबिलियत साबित कर दी। अपने दूसरे टेस्ट मैच में, गांगुली ने 136 और 48 रन की पारियां खेलीं। इसके बाद, 'प्रिंस ऑफ कोलकाता' के नाम से मशहूर गांगुली ने धीरे-धीरे भारतीय टीम में अपनी जगह पक्की कर ली।

सौरव गांगुली 'ऑफ-साइड' में इतने बेहतरीन शॉट लगाते थे कि उन्हें 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' कहा जाने लगा। वह एक भरोसेमंद बल्लेबाज भी थे। 26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ वनडे वर्ल्ड कप मैच में, गांगुली ने राहुल द्रविड़ के साथ मिलकर दूसरे विकेट के लिए 318 रन की रिकॉर्ड साझेदारी की। सचिन तेंदुलकर के साथ उन्होंने 176 पारियों में 47.55 की औसत से कुल 8,227 रन बनाए। 26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ ही उन्होंने 158 गेंदों में 7 छक्कों और 17 चौकों की मदद से 183 रन की शानदार पारी खेली थी।

मैच फिक्सिंग के विवादों के कारण भारतीय क्रिकेट उस समय मुश्किल दौर से गुजर रहा था। इसी बीच, सचिन तेंदुलकर ने भी कप्तानी छोड़ दी थी। ऐसे में, गांगुली को टीम की कमान सौंपी गई। उनके नेतृत्व ने टीम में एक नया जोश भर दिया। गांगुली की कप्तानी में, भारत ने आक्रामक रवैये के साथ खेलना सीखा। यह वह दौर था जब भारतीय खिलाड़ी विपक्षी टीम के खिलाड़ियों को सीधे चुनौती देते थे और अपनी बात रखते थे।

गांगुली की कप्तानी में भारत ने 'आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी 2002' का संयुक्त खिताब जीता और 'वनडे वर्ल्ड कप 2003' के फाइनल में भी जगह बनाई। दादा के नेतृत्व में, टीम इंडिया ने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी दिग्गज टीमों को उनके घर में जाकर हराया और अपनी ताकत का अहसास कराया। सौरव गांगुली ने युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, जहीर खान और महेंद्र सिंह धोनी जैसे कई युवा खिलाड़ियों को तराशा और उन्हें आगे बढ़ने का मौका दिया। भारतीय क्रिकेट में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए, गांगुली को साल 1997 में 'अर्जुन अवॉर्ड' और साल 2004 में 'पद्म श्री' से सम्मानित किया गया।

गांगुली का जन्म 8 जुलाई 1971 को कोलकाता के एक ऐसे परिवार में हुआ था जहाँ क्रिकेट का माहौल था। उनके पिता चंडीदास गांगुली एक जाने-माने क्लब क्रिकेटर थे और उनके बड़े भाई स्नेहाशीष भी बंगाल के लिए रणजी ट्रॉफी खेल चुके थे। घर में हमेशा क्रिकेट की चर्चाएं होती रहती थीं। परिवार के ज्यादातर सदस्य बाएं हाथ से बल्लेबाजी करते थे, इसलिए सौरव ने भी इसी अंदाज में खेलना सीखा। हालांकि, शुरुआत में उन्होंने फुटबॉल को ज्यादा पसंद किया, लेकिन 13 साल की उम्र में क्रिकेट कैंप में जाने के बाद उनका रुझान क्रिकेट की ओर बढ़ा। बंगाल और ओडिशा के बीच एक अंडर-15 मैच में उन्हें मौका मिला और उन्होंने शतक जड़कर सबको चौंका दिया। यह उनके करियर का एक अहम मोड़ था।

घरेलू क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के बाद, गांगुली को 1992 में वेस्टइंडीज के खिलाफ वनडे में डेब्यू का मौका मिला, लेकिन वह सिर्फ 3 रन बना पाए और टीम से बाहर हो गए। करीब चार साल बाद, 1996 में, उन्हें टेस्ट क्रिकेट में मौका मिला और उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ पहली ही पारी में 131 रन बनाकर अपनी छाप छोड़ी। इसके बाद उन्होंने लगातार अच्छा प्रदर्शन किया और भारतीय टीम में अपनी जगह पक्की कर ली। उनकी ऑफ-साइड की बल्लेबाजी इतनी शानदार थी कि उन्हें 'गॉड ऑफ ऑफ-साइड' कहा जाने लगा।

गांगुली एक बेहतरीन बल्लेबाज होने के साथ-साथ एक शानदार जोड़ीदार भी थे। 26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ वर्ल्ड कप मैच में उन्होंने राहुल द्रविड़ के साथ मिलकर 318 रन की अटूट साझेदारी की। सचिन तेंदुलकर के साथ उनकी जोड़ी भी बहुत सफल रही, उन्होंने 176 पारियों में 47.55 की औसत से 8,227 रन बनाए। 26 मई 1999 को श्रीलंका के खिलाफ ही उन्होंने 183 रन की अपनी सर्वश्रेष्ठ वनडे पारी खेली थी, जिसमें उन्होंने 158 गेंदों का सामना करते हुए 7 छक्के और 17 चौके लगाए थे।

जब भारतीय क्रिकेट मैच फिक्सिंग के विवादों से जूझ रहा था और सचिन तेंदुलकर ने कप्तानी छोड़ दी थी, तब सौरव गांगुली को टीम की कमान सौंपी गई। उनके नेतृत्व में टीम इंडिया ने एक नई ऊर्जा के साथ खेलना शुरू किया। गांगुली ने टीम में आक्रामकता का संचार किया और खिलाड़ियों को विपक्षी टीमों का सामना करने के लिए प्रेरित किया। उनकी कप्तानी में भारत ने 2002 में आईसीसी चैंपियंस ट्रॉफी जीती और 2003 के वनडे वर्ल्ड कप के फाइनल में पहुंचा। उन्होंने इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसी मजबूत टीमों को उनके घर में जाकर हराया। गांगुली ने युवराज सिंह, वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह, जहीर खान और महेंद्र सिंह धोनी जैसे युवा खिलाड़ियों को मौका दिया और उन्हें टीम का अहम हिस्सा बनाया। भारतीय क्रिकेट में उनके योगदान के लिए उन्हें 1997 में अर्जुन अवॉर्ड और 2004 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया।