रेड सी में हूथी विद्रोहियों की नाकेबंदी: भारत की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर क्या होगा असर?
रेड सी में हूथी विद्रोहियों की नाकेबंदी: भारत की अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर क्या होगा असर?
NewsPoint•
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच, यमन के हूथी विद्रोहियों ने रेड सी (लाल सागर) में समुद्री नाकेबंदी का ऐलान कर दिया है। इससे सऊदी अरब और इस रास्ते से गुजरने वाले व्यावसायिक जहाजों को निशाना बनाया जा रहा है। इस नाकेबंदी का असर दिखने लगा है, जहाँ भारत और चीन जा रहे कच्चे तेल से लदे दो बड़े टैंकरों को अपना रास्ता बदलना पड़ा है। यह विवाद सिर्फ़ दो देशों तक सीमित नहीं है, बल्कि रेड सी के सबसे संकरे और संवेदनशील हिस्से, बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य (स्ट्रेट) के बाधित होने से भारतीय अर्थव्यवस्था और आम नागरिकों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा। यह जलमार्ग एशिया और यूरोप के बीच दुनिया का सबसे छोटा समुद्री व्यापार मार्ग है, जिससे दुनिया का 12 से 15 प्रतिशत समुद्री व्यापार होता है।
बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य, यमन और अफ़्रीकी देशों जिबूती और इरिट्रिया के बीच स्थित एक बहुत ही संकरा समुद्री रास्ता है। यह अपने सबसे संकरे बिंदु पर केवल 29 किलोमीटर चौड़ा है। इसे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए 'चोकपॉइंट' यानी एक महत्वपूर्ण बाधा या प्रवेश द्वार माना जाता है। यह जलमार्ग लाल सागर को स्वेज नहर के ज़रिए भूमध्य सागर से जोड़ता है। सीधे शब्दों में कहें तो, यह एशिया और यूरोप के बीच दुनिया का सबसे छोटा समुद्री व्यापार मार्ग है। इस रास्ते से दुनिया का लगभग 12 से 15 प्रतिशत समुद्री व्यापार होता है। ग्लोबल स्तर पर, समुद्र के ज़रिए ट्रांसपोर्ट किए जाने वाले कंटेनर कार्गो का 20 से 30 प्रतिशत हिस्सा इसी कॉरिडोर का इस्तेमाल करता है। U.S. एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन के अनुसार, हर दिन लगभग 8.8 मिलियन बैरल कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद, साथ ही 4.1 बिलियन क्यूबिक फ़ीट लिक्विफाइड नेचुरल गैस (LNG) इस रास्ते से गुज़रते हैं।भारत के लिए बाब-अल-मंदेब का महत्व बहुत ज़्यादा है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक देश है और अपनी तेल की ज़रूरतों का 85 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। ऐसे में, बाब-अल-मंदेब का रास्ता भारत के लिए एक जीवन रेखा (लाइफ़लाइन) की तरह है, जो उसकी सुरक्षा और अर्थव्यवस्था दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा असर पड़ेगा। सऊदी अरब, इराक और खाड़ी देशों से तेल और गैस की बड़ी खेप इसी रास्ते से भारत पहुँचती है। अगर हूथी विद्रोहियों की नाकेबंदी से यह रास्ता बंद या असुरक्षित हो जाता है, तो भारत की कच्चे तेल की सप्लाई में रुकावट आ सकती है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।
एक्सपोर्ट और इम्पोर्ट पर भी असर पड़ेगा। यूरोप, उत्तरी अफ्रीका और अमेरिका के साथ भारत के व्यापार का एक बड़ा हिस्सा रेड सी-स्वेज नहर कॉरिडोर से होकर गुजरता है। भारतीय एक्सपोर्ट, जैसे कृषि उत्पाद, कपड़ा, इंजीनियरिंग का सामान और दवाइयाँ, की डिलीवरी में देरी होगी। इससे भारतीय कंपनियों को नुकसान होगा और अंतर्राष्ट्रीय बाज़ारों में उनकी प्रतिष्ठा पर भी असर पड़ सकता है।
अगर रास्ता बदला जाए तो शिपिंग का खर्च कितना बढ़ेगा? जब बाब-अल-मंडेब का रास्ता खतरनाक हो जाता है, तो शिपिंग कंपनियों के पास सिर्फ़ एक मुख्य विकल्प बचता है: अफ्रीका महाद्वीप का चक्कर लगाकर जाना। इसे 'केप ऑफ़ गुड होप' रूट कहा जाता है। रास्ता बदलने से भारी आर्थिक नुकसान होता है और समय भी बर्बाद होता है। जहाजों को अफ्रीका के दक्षिणी सिरे से घूमकर अतिरिक्त 3,000 से 3,500 नॉटिकल मील की दूरी तय करनी पड़ती है। इससे यात्रा में 10 से 15 दिन और लगेंगे। 15 दिन अतिरिक्त जहाज चलाने से ईंधन, क्रू की सैलरी और माल ढुलाई का खर्च काफी बढ़ जाएगा। इसके अलावा, क्योंकि यह इलाका संघर्ष वाला क्षेत्र है, इसलिए बीमा कंपनियाँ 'वॉर रिस्क इंश्योरेंस' प्रीमियम तेज़ी से बढ़ा रही हैं, जिससे प्रति शिपमेंट खर्च दोगुना या तिगुना हो जाता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था और आपकी जेब पर असर: अगर नाकेबंदी जारी रहती है, तो भारत पर कई तरह से असर पड़ेगा। इम्पोर्ट बिल में बढ़ोतरी होगी। तेल और माल ढुलाई की बढ़ती लागत से भारत का विदेशी मुद्रा भंडार तेज़ी से कम होगा और देश का इम्पोर्ट बिल बढ़ेगा। महंगाई का खतरा भी बढ़ेगा। जैसे-जैसे कच्चे तेल की कीमतें बढ़ेंगी, पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की घरेलू कीमतें भी बढ़ सकती हैं। इससे ट्रांसपोर्टेशन का खर्च बढ़ेगा, जिससे सब्ज़ियों, किराने के सामान और रोज़मर्रा की ज़रूरी चीज़ों की कीमतें आसमान छूने लगेंगी। आम आदमी के लिए जीवन और भी महंगा हो जाएगा।
क्या भारत के पास कोई बैकअप प्लान है? भारत ने ऐसे संकट से निपटने के लिए खास तैयारियाँ की हैं। देश के भीतर भूमिगत गुफाओं में कच्चे तेल का इमरजेंसी स्टॉक रखा जाता है, जो कुछ हफ़्तों की ज़रूरतें पूरी करने में सक्षम है। यह स्टॉक किसी भी अप्रत्याशित घटना से निपटने में मदद करता है। इसके अलावा, किसी एक देश या रास्ते पर निर्भर रहने के बजाय, भारत अब रूस, पश्चिम अफ्रीका और अमेरिका जैसे दूसरे इलाकों से कच्चा तेल मंगा रहा है। यह विविधीकरण भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करता है और किसी एक स्रोत पर निर्भरता कम करता है।
यमन के रेड सी तट पर बढ़ता तनाव सिर्फ़ मध्य पूर्व का मामला नहीं है; बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य का बंद होना या वहां असुरक्षा की स्थिति भारत समेत पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए एक बड़ी चेतावनी है। अगर ये तनाव जल्द कम नहीं हुए, तो आम लोगों को चीज़ों और ईंधन की बढ़ी हुई कीमतों का बोझ उठाना पड़ सकता है। यह स्थिति वैश्विक व्यापार और शांति के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करती है।