सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की छूट: अमेरिका-सऊदी परमाणु समझौते पर छिड़ी बहस

NewsPoint
Navbharat Times
वाशिंगटन, 23 जुलाई: अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुए एक नए परमाणु सहयोग समझौते ने अमेरिकी कांग्रेस और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच हड़कंप मचा दिया है। इस समझौते के तहत सऊदी अरब को भविष्य में यूरेनियम संवर्धन की क्षमता मिल सकती है, जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने यह अहम समझौता किया है, जिसमें सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की दिशा में आगे बढ़ने का मौका मिलेगा, जबकि परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों की अहम भूमिका होगी। हालांकि, समझौते में सुरक्षा प्रावधान भी हैं जो सऊदी अरब को हथियार बनाने के लिए यूरेनियम संवर्धन से रोकने का दावा करते हैं। इसके तहत, यदि संवर्धन की अनुमति मिलती है, तो यह अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगा और तकनीक सऊदी अरब को हस्तांतरित नहीं की जाएगी। लेकिन, एक विशेष छूट के तहत सऊदी अरब को सामान्य अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट मिलेगी और अमेरिकी विशेषज्ञ ही निरीक्षण करेंगे, जो चिंता का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है।

अमेरिकी ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने इस समझौते को अमेरिका और सऊदी अरब के बीच आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने वाला बताया है। उन्होंने दावा किया कि यह समझौता परमाणु सुरक्षा और अप्रसार के उच्चतम मानकों का पालन करता है और इसमें अमेरिकी तकनीक और विशेषज्ञता का इस्तेमाल होगा। यह समझौता अमेरिकी परमाणु ऊर्जा अधिनियम की धारा 123 के तहत किया गया है और अब इसे कांग्रेस के पास भेजा जाएगा, जहां सांसदों के पास इसकी समीक्षा के लिए 90 दिन का समय होगा। हालांकि, अगर कांग्रेस इसे अस्वीकार भी करती है, तो राष्ट्रपति वीटो का इस्तेमाल करके इसे लागू करा सकते हैं। समझौते के अनुसार, दोनों देश अगले दो साल तक यह अध्ययन करेंगे कि सऊदी अरब में यूरेनियम संवर्धन आर्थिक और तकनीकी रूप से कितना जरूरी और व्यावहारिक है।
वर्तमान में दुनिया में परमाणु ईंधन की आपूर्ति तो है, लेकिन परमाणु ऊर्जा के बढ़ते वैश्विक इस्तेमाल को देखते हुए भविष्य में इसकी मांग बढ़ने की संभावना है। परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का समझौता एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है और दूसरे देश भी ऐसी ही मांग कर सकते हैं। उनका तर्क है कि इससे परमाणु हथियारों के प्रसार को रोकने की वैश्विक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस समझौते को लेकर इजरायल में भी चिंता बढ़ गई है। पूर्व प्रधानमंत्री नफ्ताली बेनेट ने इसे इजरायल की सुरक्षा के लिए एक गंभीर रणनीतिक विफलता बताया है। उन्होंने कहा कि इससे पश्चिम एशिया में परमाणु हथियारों की होड़ शुरू होने का खतरा बढ़ सकता है। इजरायली रक्षा विशेषज्ञों ने भी इसे क्षेत्रीय स्थिरता के लिए चिंताजनक बताया है।

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले ही कह चुके हैं कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी वही करेगा। यही वजह है कि इस समझौते को लेकर अमेरिका, इजरायल और वैश्विक सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच गंभीर बहस छिड़ गई है। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और बराक ओबामा के मध्य-पूर्व सलाहकार रह चुके रिचर्ड नेफ्यू ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षकों की भूमिका सीमित करना भविष्य के लिए खतरनाक मिसाल साबित हो सकता है। नेफ्यू ने कहा कि अमेरिकी निरीक्षक तकनीकी रूप से सक्षम हैं, लेकिन केवल अमेरिकी निगरानी पर अन्य देशों का भरोसा बनना मुश्किल है। उनके मुताबिक, अगर ईरान जैसे देश यह कहें कि उनके परमाणु कार्यक्रम की जांच केवल रूस करेगा, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। इसी तरह, अगर रूस कहे कि क्यूबा के परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच वह स्वयं कर रहा है तो अमेरिका उस पर भी भरोसा नहीं करेगा। उन्होंने कहा कि मौजूदा वैश्विक माहौल में केवल एक देश के निरीक्षण पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं है।

इस समझौते का सबसे बड़ा फायदा अमेरिकी परमाणु ऊर्जा कंपनी वेस्टिंग हाउस को मिलने की संभावना है। हालांकि समझौते में कंपनी का नाम नहीं है, लेकिन इसमें यह प्रावधान है कि सऊदी अरब के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे वेस्टिंग हाउस के एपी 1000 रिएक्टरों के इस्तेमाल की संभावना काफी बढ़ गई है। ये रिएक्टर लाखों घरों को बिजली उपलब्ध कराने में सक्षम हैं। समझौते में यूरेनियम खनन, रिएक्टर निर्माण के उपकरण और अन्य आपूर्ति शृंखला से जुड़ी अमेरिकी कंपनियों को भी प्राथमिकता देने की बात कही गई है। हालांकि, अगर जरूरत पड़ती है तो सऊदी अरब अन्य देशों से सामग्री, पुर्जे और विशेषज्ञता भी हासिल कर सकेगा।

अमेरिकी कांग्रेस में भी इस समझौते का विरोध शुरू हो गया है। कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने प्रतिनिधि सभा की विदेश मामलों की समिति की बैठक में कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से शुरू हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि यह नहीं कहा जा सकता कि अगले 10 वर्षों में सऊदी अरब की सत्ता किसके हाथ में होगी। शेरमन ने कहा, "आज अमेरिका ईरान के यूरेनियम संवर्धन और पुनर्प्रसंस्करण कार्यक्रम का विरोध कर रहा है, लेकिन दूसरी ओर सऊदी अरब को उसी दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति दे रहा है। दोनों मामलों में फर्क सिर्फ इतना दिखता है कि इस बार अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।" उन्होंने यह भी याद दिलाया कि मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो सीनेटर रहते हुए "नो न्यूक्लियर वेपन्स फॉर सऊदी अरेबिया एक्ट" के सह-प्रायोजक थे। इस प्रस्ताव का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते को लागू करने से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी आवश्यक हो। वहीं, फिलीपींस दौरे पर पत्रकारों से बातचीत में विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने समझौते पर विस्तार से टिप्पणी करने से इनकार किया। उन्होंने केवल इतना कहा कि अमेरिका ऐसा कोई भी समझौता नहीं करेगा जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा पैदा हो।

समझौते के तहत, सऊदी अरब को यूरेनियम संवर्धन की क्षमता मिलने का रास्ता साफ हो गया है। इसका मतलब है कि सऊदी अरब अपने परमाणु ऊर्जा कार्यक्रमों के लिए खुद यूरेनियम को ऐसे रूप में बदल सकेगा जिसका इस्तेमाल परमाणु रिएक्टरों में ईंधन के तौर पर किया जा सके। यह एक बहुत ही संवेदनशील प्रक्रिया है क्योंकि यूरेनियम को इस तरह से संवर्धित किया जा सकता है कि उसका इस्तेमाल परमाणु हथियार बनाने में भी हो सके। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस पर कड़ी निगरानी रखी जाती है।

अमेरिकी प्रशासन का कहना है कि इस समझौते में ऐसे सुरक्षा उपाय शामिल हैं जो सऊदी अरब को परमाणु हथियार बनाने से रोकेंगे। उनका दावा है कि अगर यूरेनियम संवर्धन की अनुमति दी भी जाती है, तो यह प्रक्रिया पूरी तरह से अमेरिकी कंपनियों के नियंत्रण में होगी। इसका मतलब है कि सऊदी अरब खुद इस तकनीक का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा और न ही उसे यह तकनीक सिखाई जाएगी। अमेरिकी कंपनियां ही इस प्रक्रिया को अंजाम देंगी और निगरानी करेंगी।

लेकिन, इस समझौते का एक ऐसा प्रावधान है जो सबसे ज्यादा चिंता पैदा कर रहा है। वह है सऊदी अरब को अंतरराष्ट्रीय परमाणु निरीक्षणों से छूट देना। आमतौर पर, जब कोई देश परमाणु सहयोग समझौता करता है, तो अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) जैसी संस्थाएं उस देश के परमाणु कार्यक्रमों की कड़ी निगरानी करती हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि परमाणु सामग्री का गलत इस्तेमाल न हो। लेकिन इस समझौते में, सऊदी अरब को इन अंतरराष्ट्रीय निरीक्षणों से छूट मिल गई है। इसकी जगह, अमेरिकी विशेषज्ञ ही निरीक्षण करेंगे।

यहीं पर कांग्रेस और परमाणु अप्रसार विशेषज्ञों की सबसे बड़ी चिंता है। उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों की जगह केवल अमेरिकी निरीक्षकों पर निर्भर रहना एक खतरनाक मिसाल कायम कर सकता है। रिचर्ड नेफ्यू, जो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन और बराक ओबामा के मध्य-पूर्व सलाहकार रह चुके हैं, ने इस पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी निरीक्षक भले ही तकनीकी रूप से सक्षम हों, लेकिन दूसरे देशों का केवल अमेरिकी निगरानी पर भरोसा करना मुश्किल है। उन्होंने एक उदाहरण देते हुए कहा कि अगर ईरान यह कहे कि उसके परमाणु कार्यक्रम की जांच सिर्फ रूस करेगा, तो अमेरिका इसे कभी स्वीकार नहीं करेगा। इसी तरह, अगर रूस कहे कि क्यूबा के परमाणु प्रतिष्ठानों की जांच वह खुद कर रहा है, तो अमेरिका उस पर भी भरोसा नहीं करेगा। नेफ्यू का कहना है कि आज के वैश्विक माहौल में, केवल एक देश की निगरानी पर निर्भर रहना व्यावहारिक नहीं है।

इस समझौते से अमेरिकी कंपनियों को बड़ा आर्थिक फायदा होने की उम्मीद है। खासकर वेस्टिंग हाउस जैसी परमाणु ऊर्जा कंपनी को। हालांकि समझौते में कंपनी का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया है, लेकिन यह स्पष्ट है कि सऊदी अरब के परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और आपूर्ति में अमेरिकी कंपनियों को प्राथमिकता दी जाएगी। इससे वेस्टिंग हाउस के एपी 1000 रिएक्टरों की बिक्री की संभावना बढ़ जाती है। ये रिएक्टर बहुत शक्तिशाली होते हैं और लाखों घरों को बिजली दे सकते हैं। इसके अलावा, यूरेनियम खनन, रिएक्टर बनाने के उपकरण और अन्य संबंधित आपूर्ति शृंखला में भी अमेरिकी कंपनियों को फायदा होगा। हालांकि, यह भी कहा गया है कि अगर जरूरत पड़ी तो सऊदी अरब अन्य देशों से भी सामग्री, पुर्जे और विशेषज्ञता ले सकेगा।

अमेरिकी कांग्रेस में भी इस समझौते का विरोध शुरू हो गया है। कैलिफोर्निया से डेमोक्रेट सांसद ब्रैड शेरमन ने इस मुद्दे को उठाया है। उन्होंने कहा कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी कभी अमेरिकी तकनीक से शुरू हुआ था। उन्होंने सवाल उठाया कि हम यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि अगले 10 सालों में सऊदी अरब की सत्ता किसके हाथ में होगी और वे इस तकनीक का इस्तेमाल कैसे करेंगे। शेरमन ने कहा कि यह विरोधाभासी है कि अमेरिका एक तरफ ईरान के यूरेनियम संवर्धन का विरोध कर रहा है, और दूसरी तरफ सऊदी अरब को उसी दिशा में आगे बढ़ने की अनुमति दे रहा है। उनका मानना है कि इस बार का अंतर सिर्फ इतना है कि अमेरिकी कंपनियों को आर्थिक लाभ मिलेगा।

शेरमन ने यह भी याद दिलाया कि मौजूदा विदेश मंत्री मार्को रुबियो, जब सीनेटर थे, तब उन्होंने "नो न्यूक्लियर वेपन्स फॉर सऊदी अरेबिया एक्ट" का समर्थन किया था। इस कानून का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि सऊदी अरब के साथ किसी भी परमाणु समझौते को लागू करने से पहले कांग्रेस की स्पष्ट मंजूरी जरूरी हो।

हालांकि, विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने फिलीपींस दौरे पर इस समझौते पर ज्यादा कुछ कहने से इनकार कर दिया। उन्होंने बस इतना कहा कि अमेरिका ऐसा कोई भी समझौता नहीं करेगा जिससे परमाणु हथियारों के प्रसार का खतरा बढ़े।

यह समझौता पश्चिम एशिया में एक नई परमाणु दौड़ को बढ़ावा दे सकता है, खासकर सऊदी अरब के क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी ईरान के साथ। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने पहले ही सार्वजनिक रूप से कहा है कि अगर ईरान परमाणु हथियार हासिल करता है, तो सऊदी अरब भी ऐसा ही करेगा। इस स्थिति में, यह समझौता क्षेत्र में तनाव को और बढ़ा सकता है।

यह पूरा मामला जटिल है और इसमें सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के कई पहलू जुड़े हुए हैं। अमेरिकी कांग्रेस की मंजूरी और भविष्य में सऊदी अरब के परमाणु कार्यक्रमों पर होने वाली निगरानी इस समझौते के भविष्य को तय करेगी।