ट्रंप और नेतन्याहू की ईरान पर बैठक: तीन विकल्पों पर चर्चा, सैन्य कार्रवाई की चेतावनी
ट्रंप और नेतन्याहू की ईरान पर बैठक: तीन विकल्पों पर चर्चा, सैन्य कार्रवाई की चेतावनी
NewsPoint•
व्हाइट हाउस में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई लगभग 90 मिनट की गुप्त बैठक में ईरान पर कड़े प्रतिबंधों और संभावित सैन्य कार्रवाई सहित तीन मुख्य विकल्पों पर गहन चर्चा हुई। यह मुलाकात ऐसे समय में हुई जब अमेरिका ने हाल ही में ईरान पर हमले रोके थे, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव अभी भी चरम पर था। बैठक के कुछ ही घंटों बाद, ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिसके जवाब में ट्रंप ने कड़े जवाबी हमले की चेतावनी दी। इस बैठक में ईरान के साथ कूटनीतिक समाधान, आर्थिक दबाव और सैन्य कार्रवाई जैसे विकल्पों पर विचार किया गया, साथ ही सीरिया के हालात और सऊदी अरब के साथ संभावित परमाणु समझौते पर भी बात हुई। नेतन्याहू ने यह भी स्पष्ट किया कि इज़राइल अगले दशक में अमेरिकी सैन्य सहायता पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और इज़राइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच व्हाइट हाउस में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों को लेकर गंभीर चिंताएं जताई गईं। लगभग डेढ़ घंटे तक चली इस बंद कमरे की बातचीत में, ईरान के खिलाफ अपनाए जाने वाले संभावित कदमों पर विस्तार से चर्चा हुई। यह बैठक ऐसे नाजुक समय में हुई जब अमेरिका ने हाल ही में ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई को टाल दिया था, लेकिन दोनों देशों के बीच तनाव कम नहीं हुआ था। बैठक समाप्त होने के कुछ ही घंटों के भीतर, ईरान ने जॉर्डन में स्थित एक अमेरिकी सैन्य अड्डे पर बैलिस्टिक मिसाइलें दागीं, जिसने स्थिति को और भी गंभीर बना दिया। इस घटना के बाद, राष्ट्रपति ट्रंप ने ईरान को कड़े जवाबी हमले की चेतावनी दी।ट्रंप और नेतन्याहू ने ईरान के संबंध में तीन मुख्य विकल्पों पर विचार-विमर्श किया। पहला विकल्प कूटनीतिक समाधान का था। इस दिशा में, ट्रंप प्रशासन के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर ईरानी अधिकारियों के साथ बातचीत में लगे हुए थे। हालांकि, कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए थे। इज़राइली अधिकारियों ने चिंता जताई कि ईरान ऐसा कोई समझौता स्वीकार नहीं करेगा जो उसके परमाणु कार्यक्रम पर प्रभावी ढंग से रोक लगा सके। इसके बावजूद, बातचीत के रास्ते पूरी तरह से बंद नहीं हुए थे और इसे एक मुख्य विकल्प के तौर पर देखा जा रहा था।
दूसरा विकल्प ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाने की रणनीति पर केंद्रित था। इसमें होर्मुज जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ होर्मुज) के आसपास नौसैनिक नाकेबंदी बनाए रखना और नए प्रतिबंध लगाना शामिल था। नेतन्याहू का मानना था कि होर्मुज जलडमरूमध्य ईरान के पास अमेरिका पर दबाव बनाने के लिए बचा सबसे महत्वपूर्ण हथियार है। इसलिए, आर्थिक प्रतिबंधों को और कड़ा करने और ईरान के आय के स्रोतों पर दबाव बढ़ाने पर जोर दिया गया। इस रणनीति का उद्देश्य ईरान को उसकी परमाणु महत्वाकांक्षाओं से पीछे हटने के लिए मजबूर करना था।
तीसरा विकल्प सैन्य हमले को फिर से शुरू करने का था। यदि कूटनीतिक और आर्थिक प्रतिबंध विफल साबित होते हैं, तो अमेरिका और इज़राइल ईरान के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य अभियान शुरू कर सकते हैं। हालांकि, नेतन्याहू ने ट्रंप पर तुरंत हमला करने का दबाव नहीं डाला। उन्होंने स्पष्ट किया कि अंतिम निर्णय अमेरिकी राष्ट्रपति का होगा। एक इज़राइली अधिकारी ने बताया कि बैठक का मुख्य उद्देश्य किसी एक विशेष विकल्प को चुनने के लिए जोर देना नहीं था, बल्कि सभी उपलब्ध विकल्पों के संभावित परिणामों का सावधानीपूर्वक आकलन करना था।
बैठक के दौरान, राष्ट्रपति ट्रंप ने लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले संभावित असर को लेकर अपनी चिंता व्यक्त की। उन्होंने विशेष रूप से ऊर्जा की कीमतों में संभावित बढ़ोतरी और वैश्विक बाजारों पर इसके नकारात्मक प्रभाव का जिक्र किया। इज़राइल का मानना है कि ईरान आर्थिक रूप से कमजोर हो रहा है और उसके नेतृत्व में इस बात को लेकर आंतरिक मतभेद हैं कि टकराव जारी रखा जाए या आर्थिक संकट से बचने के लिए कोई समझौता किया जाए। यह आंतरिक विभाजन ईरान की नीतियों को प्रभावित कर सकता है।
ईरान के अलावा, सीरिया के बिगड़ते हालात पर भी बैठक में विस्तार से चर्चा हुई। नेतन्याहू ने राष्ट्रपति ट्रंप को एक नक्शा दिखाया, जिसमें तुर्की की तुलना में इज़राइल की सैन्य मौजूदगी काफी कम दिखाई गई थी। उन्होंने कहा कि जब तक जिहादी समूहों से खतरा बना रहेगा, इज़राइल दक्षिणी सीरिया में अपनी सुरक्षा उपस्थिति बनाए रखेगा। यह दर्शाता है कि इज़राइल अपनी सीमाओं की सुरक्षा को लेकर कितना गंभीर है।
दोनों नेताओं ने अमेरिका और सऊदी अरब के बीच संभावित परमाणु समझौते पर भी चर्चा की। राष्ट्रपति ट्रंप ने इस मुद्दे को सऊदी अरब और इज़राइल के बीच भविष्य में संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखा। यह संकेत देता है कि अमेरिका मध्य पूर्व में शांति और स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए क्षेत्रीय सहयोग को प्रोत्साहित कर रहा है।
एक महत्वपूर्ण बात यह सामने आई कि नेतन्याहू ने अमेरिका के सामने एक लंबी अवधि की रक्षा योजना पेश की। इस योजना के अनुसार, इज़राइल का लक्ष्य अगले दशक में अमेरिकी सैन्य सहायता पर अपनी निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए, नए रक्षा समझौतों, मिसाइल रक्षा प्रणालियों के संयुक्त विकास और आधुनिक हथियारों के उत्पादन के ज़रिए सहयोग बढ़ाने के प्रस्ताव रखे गए। खबरों के अनुसार, नेतन्याहू ने इज़राइल के रक्षा उद्योग को अगली पीढ़ी के स्वदेशी लड़ाकू विमान को विकसित करने पर काम शुरू करने का निर्देश भी दिया है। इसका उद्देश्य भविष्य में अमेरिकी F-35 लड़ाकू विमान पर निर्भरता को कम करना है। यह इज़राइल की अपनी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और आत्मनिर्भर बनने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।