ऑक्सफोर्ड में आचार्य प्रशांत: ईशावास्य उपनिषद का जीवंत अर्थ और आधुनिक संकट पर वेदांत की दृष्टि
ऑक्सफोर्ड में आचार्य प्रशांत: ईशावास्य उपनिषद का जीवंत अर्थ और आधुनिक संकट पर वेदांत की दृष्टि
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ऑक्सफोर्ड में भारतीय दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने ईशावास्य उपनिषद के जीवंत अर्थ को समझाया। उन्होंने बताया कि बाहरी उपलब्धियों के बावजूद मनुष्य आंतरिक संकट में है। आत्मज्ञान के बिना पर्यावरण, सांप्रदायिकता और मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं हल नहीं हो सकतीं। आचार्य प्रशांत ने अहम को दुख का कारण बताते हुए सच्ची स्वतंत्रता की बात कही।
ऑक्सफोर्ड, 10 जून (आईएएनएस)। करीब डेढ़ सौ साल पहले जिस ऑक्सफोर्ड से प्रोफेसर मैक्स म्यूलर ने 'ईशावास्य उपनिषद' का पहला अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित कराकर इसे पश्चिम तक पहुंचाया था, उसी भूमि पर एक भारतीय दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने 8 जून को उसी उपनिषद को उसके मूल, जीवंत अर्थ में लौटाने का प्रयास किया। आचार्य प्रशांत ने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के मैनर रोड बिल्डिंग में 'ईशावास्य उपनिषद' के दूसरे श्लोक पर एक विस्तृत दार्शनिक सत्र को संबोधित किया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बाहरी दुनिया में कितनी भी प्रगति क्यों न हो जाए, जब तक मनुष्य खुद को नहीं परखता, तब तक किसी भी संकट का समाधान संभव नहीं है। यह सत्र पश्चिमी दुनिया में भारतीय दर्शन की बढ़ती प्रासंगिकता और आत्म-ज्ञान के महत्व को रेखांकित करता है।
मैक्स म्यूलर, जो ऑक्सफोर्ड में तुलनात्मक भाषाविज्ञान के पहले प्रोफेसर थे, ने 'सेक्रेड बुक्स ऑफ द ईस्ट' श्रृंखला की देखरेख की थी। इसी श्रृंखला के पहले खंड में उन्होंने 1879 में 'ईशावास्य उपनिषद' का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करवाया था। अब, लगभग डेढ़ शताब्दी बाद, आचार्य प्रशांत उसी ऑक्सफोर्ड की धरती पर पहुंचे, ताकि वे इस प्राचीन ग्रंथ के उस अर्थ को फिर से जीवित कर सकें, जिसकी आज के आधुनिक संसार को सख्त जरूरत है। सत्र से पहले, ऑक्सफोर्ड के छात्रों ने आचार्य प्रशांत को परिसर की सैर कराई, जिसमें ऐतिहासिक न्यू कॉलेज और सॉमरविल कॉलेज जैसे महत्वपूर्ण स्थल शामिल थे।ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस की इमारत के सामने आईएएनएस से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने कहा, "मैक्स म्यूलर ने इस ग्रंथ को पश्चिम तक पहुंचाने का असाधारण काम किया। लेकिन शब्दों को जीवन देना पड़ता है, और जीवन यही क्षण है। आज मैं उपनिषद की उस प्रासंगिकता को सामने रखने आया हूं, जिसकी आज के संसार को आवश्यकता है।" यह बयान इस बात पर प्रकाश डालता है कि ज्ञान को केवल किताबों में बंद नहीं रखा जा सकता, बल्कि उसे वर्तमान जीवन में उतारना आवश्यक है।
जिस मैनर रोड बिल्डिंग में यह सत्र आयोजित हुआ, वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के अर्थशास्त्र विभाग का केंद्र है। यह प्रतिष्ठित एटकिंसन मेमोरियल लेक्चर का भी स्थल रहा है, जहाँ हाल के वर्षों में नोबेल पुरस्कार विजेताओं सहित अर्थशास्त्र, तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और जलवायु जैसे क्षेत्रों के विश्व के अग्रणी विचारक संबोधित कर चुके हैं। इसी भवन में, जहाँ अर्थशास्त्र और नीति जैसे विषय पढ़ाए जाते हैं, आचार्य प्रशांत ने वेदांत की दृष्टि से यह तर्क प्रस्तुत किया कि अकेले अर्थशास्त्र, तकनीक या नीति इस दुनिया के संकट को हल नहीं कर सकते। उन्होंने कहा कि जब तक उपभोग करने वाला मनुष्य स्वयं को नहीं परखता, तब तक कोई भी बाहरी समाधान अधूरा ही रहेगा।
मीडिया से बातचीत में आचार्य प्रशांत ने अपने संदेश को एक व्यापक चेतावनी का रूप दिया। उन्होंने कहा कि पश्चिम ने बाहरी दुनिया में, चाहे वह ब्रह्मांड का अन्वेषण हो, परमाणु के रहस्यों को खोलना हो या शरीर के अंदर की गहराइयों को समझना हो, असाधारण उपलब्धियां हासिल की हैं। इसके बावजूद, मानवता आज छठे बड़े पैमाने पर विलुप्ति के दौर से गुजर रही है, और यह संकट पूरी तरह से मनुष्य द्वारा ही गढ़ा गया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जिन उपकरणों, तकनीकों और आर्थिक समृद्धि पर हमें गर्व है, वही आज विनाश का कारण बन रहे हैं।
आचार्य प्रशांत का मत था कि आत्मज्ञान और आत्मा की व्यापक आंतरिक शिक्षा के बिना किसी भी प्रकार की मुक्ति की संभावना बहुत क्षीण है। उन्होंने कहा कि यह बात पर्यावरण संकट, सांप्रदायिकता, अंतरराष्ट्रीय विभाजन, परमाणु युद्ध के खतरे और मानसिक स्वास्थ्य की महामारी, इन सभी पर समान रूप से लागू होती है। यह एक गंभीर चेतावनी है कि बाहरी प्रगति आंतरिक विकास के बिना अधूरी है।
इस सत्र में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्रों और रिसर्च स्कॉलर्स सहित यूके, यूरोप और अमेरिका से आए एक विविध श्रोता-समूह ने भाग लिया। सत्र का केंद्रीय प्रश्न था, "कर्ता कौन है?" आचार्य प्रशांत ने समझाया कि उपनिषद कर्म से अधिक उस कर्ता में रुचि रखते हैं, जो प्रत्येक विचार, कर्म और अनुभव के पीछे खड़ा रहता है। उन्होंने विद्या (बाहरी ज्ञान) और अविद्या (आंतरिक ज्ञान) के भेद को स्पष्ट करते हुए कहा कि मनुष्य के पास बाहरी, अनुभवगम्य जगत का ज्ञान प्रचुर मात्रा में है और यह लगातार बढ़ रहा है। लेकिन, जानने वाले को जानने का कार्य आज भी अधूरा है।
उन्होंने कहा, "अहम न केवल दुख भोगता है, वह स्वयं ही दुख है।" इसका मतलब है कि हमारा 'मैं' या अहंकार ही दुखों का कारण बनता है, न कि केवल दुखों को अनुभव करता है। आचार्य प्रशांत का कहना था कि कोई भी कर्म अपने आप में न शुभ होता है और न अशुभ; वह जिस चेतना से उत्पन्न होता है, वही उसे बंधनकारी या मुक्तिदायी बनाती है। यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है कि हमारे कर्मों का परिणाम हमारे इरादों और चेतना पर निर्भर करता है।
सत्र में उन्होंने यह भी कहा कि मृत्यु का भय वास्तव में शरीर का नहीं, बल्कि अहम का भय है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अहम ही अपने अस्तित्व के मिट जाने से डरता है। उन्होंने अहम की तुलना एक ऐसे उपनिवेशक से की, जो शरीर को प्रेम से नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ के लिए जीवित रखता है। उनका कहना था कि सच्ची स्वतंत्रता अहम को और अधिक विकल्प मिलने में नहीं, बल्कि अहम की बाध्यताओं से मुक्ति में निहित है। इसी संदर्भ में उन्होंने कहा, "शरीर एक तथ्य है, अहम एक भूल।" और यह भी कि "सर्वश्रेष्ठ कर्म अहम की अनुपस्थिति में ही घटित होते हैं।"
ऑक्सफोर्ड में एक भारतीय द्वारा वेदांत पढ़ाए जाने को आचार्य प्रशांत ने एक सार्थक संयोग बताया। उन्होंने कहा कि वेदांत का ज्ञान कभी गुप्त नहीं रहा; जो भी सीखना चाहे, वह सीख सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि पात्रता का आधार जन्म, जाति या वर्ण नहीं, बल्कि साधन चतुष्टय में वर्णित योग्यताएं हैं, जो पूरी तरह से गुण-आधारित हैं। उन्होंने जोड़ा कि जिस पश्चिमी परंपरा ने कभी इस ज्ञान को बाहर से, एक अध्ययन की वस्तु के रूप में देखा था, वहां आज वही ज्ञान उसकी जीवित परंपरा के भीतर से प्रस्तुत हो रहा है।
उनका कहना था कि भारत हमेशा से ज्ञान साझा करता आया है और पश्चिम ने भी साझा किया है, क्योंकि सभी राजनीतिक और सांस्कृतिक सीमाओं से परे मनुष्य एक ही प्रजाति है, और यही एकत्व समस्त ज्ञान का आधार है। यह विचार मानवता की एकता और साझा ज्ञान की शक्ति पर जोर देता है।
यह ऑक्सफोर्ड सत्र आचार्य प्रशांत के यूके दौरे की एक महत्वपूर्ण कड़ी है, जो पहले ही कई उल्लेखनीय पड़ावों से गुजर चुका है। 30 मई को उन्होंने कैम्ब्रिज यूनियन में, कैम्ब्रिज इंडिया बिजनेस डायलॉग के अंतर्गत, कैम्ब्रिज जज बिजनेस स्कूल के प्रोफेसर जयदीप प्रभु की अध्यक्षता में आयोजित सत्र में अपना दर्शन रखा। यह सत्र नियत समय से कहीं आगे तक चला, जो इसमें शामिल लोगों की गहरी रुचि को दर्शाता है।
1 जून को एनआईएसएयू यूके द्वारा आयोजित एक संवाद सत्र में उन्होंने लॉर्ड क्रिश रावल (यूके के हाउस ऑफ लॉर्ड्स के सदस्य) के साथ जलवायु और पर्यावरण संकट के आंतरिक आयामों पर विस्तृत चर्चा की। यह दर्शाता है कि वे वैश्विक समस्याओं के मूल कारणों को समझने और उन पर चर्चा करने के लिए विभिन्न मंचों का उपयोग कर रहे हैं।
इससे पहले 6 और 7 जून को काठमांडू में आयोजित चौथे काठमांडू कलिंगा लिटरेरी फेस्टिवल में भी आचार्य प्रशांत की भागीदारी रही। वहाँ उन्होंने लंदन से ऑनलाइन जुड़ते हुए आज तक के एक वरिष्ठ संपादक के साथ बातचीत की। इसी मंच पर ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. प्रतिभा राय ने उन्हें "भारत का पुत्र" कहकर संबोधित किया, जिसे आचार्य प्रशांत ने डॉ. राय की उदारता बताते हुए स्वीकार किया।
इन सभी मंचों पर आचार्य प्रशांत का केंद्रीय तर्क एक ही रहा है, कि पश्चिमी जलवायु नीति इसलिए अपर्याप्त सिद्ध हो रही है क्योंकि वह उपभोग करने वाले अहम को अपरीक्षित छोड़ देती है। उन्होंने कहा, "बाहर से हम इतिहास में किसी भी समय की तुलना में अधिक समृद्ध और शक्तिशाली हैं। भीतर से हम आज भी आदिम मनुष्य ही हैं।" यह एक शक्तिशाली विरोधाभास है जो हमारी वर्तमान स्थिति को दर्शाता है।
उनका कहना है कि कोई शिखर सम्मेलन, कोई संधि या दक्षता में सुधार इस संकट का समाधान नहीं कर सकता, क्योंकि इनमें से कोई भी उस मूल कारक को संबोधित नहीं करता जो संकट को चला रहा है। यह मूल कारक मनुष्य का आंतरिक स्वरूप है।
आगामी सप्ताहों में आचार्य प्रशांत लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स (एलएसई) और किंग्स कॉलेज लंदन में भी सत्र आयोजित करेंगे। 20 से 28 जून तक चलने वाले लंदन क्लाइमेट ऐक्शन वीक में भी उनकी भागीदारी निर्धारित है, जो यूरोप का सबसे बड़ा स्वतंत्र जलवायु परिवर्तन से संबंधित आयोजन है। यह उनकी वैश्विक मंचों पर बढ़ती उपस्थिति और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर मुद्दों पर उनके विचारों के महत्व को दर्शाता है।
प्रशांतअद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक और हार्परकॉलिन्स द्वारा प्रकाशित 'ट्रुथ एंड एपोलॉजी' के लेखक आचार्य प्रशांत ने ऑक्सफोर्ड में आईएएनएस से कहा कि ऑक्सफोर्ड तर्क, विश्लेषण और बौद्धिक कठोरता की भूमि है। उन्होंने कहा कि वेदांत भी उन्हीं उपकरणों को भीतर की ओर मोड़ने का आग्रह करता है। उन्होंने कहा, "अंतर केवल इतना है कि जब आप इन्हीं उपकरणों को अपने ऊपर लागू करते हैं, तो भीतर से प्रतिरोध उठता है, क्योंकि वहाँ द्रष्टा ही दृश्य बन जाता है। तभी बाहरी ईमानदारी के साथ-साथ आंतरिक ईमानदारी अनिवार्य हो जाती है। आप भीतर से कैसे भी हों, अच्छे वैज्ञानिक हो सकते हैं, पर अच्छे मनुष्य नहीं।" यह कथन आत्म-निरीक्षण और आंतरिक ईमानदारी के महत्व पर जोर देता है, जो बाहरी उपलब्धियों से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।