मध्य पूर्व संकट में भारत की ऊर्जा सुरक्षा: इन्फ्रास्ट्रक्चर और विविध स्रोतों ने कैसे की मदद
मध्य पूर्व संकट में भारत की ऊर्जा सुरक्षा: इन्फ्रास्ट्रक्चर और विविध स्रोतों ने कैसे की मदद
NewsPoint•
मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में अभूतपूर्व सफलता हासिल की है। पिछले एक दशक में देश में बने मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर और तेल आयात के स्रोतों में विविधता लाने की वजह से हॉर्मुज स्ट्रेट में तनाव के बावजूद पेट्रोल पंपों और एलपीजी की आपूर्ति सामान्य बनी रही। सरकार के अनुसार, भारत ने न केवल कच्चे तेल के स्टॉक पर निर्भरता कम की, बल्कि तेल आपूर्ति करने वाले देशों की संख्या को 27 से बढ़ाकर 41 कर दिया, जिसमें लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए देश शामिल हुए हैं। अमेरिका और रूस से भी तेल की आपूर्ति बढ़ाई गई है। इसके साथ ही, तेल के आयात के रास्तों में भी बदलाव किया गया है, जिससे अब भारत का बहुत कम कच्चा तेल हॉर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है। आईएसपीआरएल के तहत रणनीतिक भंडार में लगभग 5.33 मिलियन टन तेल है, जो करीब तीन हफ्तों की जरूरत को पूरा कर सकता है। भारत उन चुनिंदा देशों में से था जिन्होंने हॉर्मुज स्ट्रेट से अपने कार्गो की आवाजाही जारी रखी और किसी भी पेट्रोलियम उत्पाद की कमी का सामना नहीं किया। इसके अलावा, एथेनॉल ब्लेंडिंग को 20 प्रतिशत तक पहुंचाने से हर साल कच्चे तेल के आयात की बड़ी मात्रा की बचत हो रही है।
सरकार ने बताया कि कच्चे तेल की कीमतें मध्य पूर्व संकट से पहले के स्तर के करीब, लगभग 74 डॉलर प्रति बैरल तक गिर गईं। स्ट्रेट से टैंकरों की आवाजाही फिर से शुरू होने के साथ कीमतें और कम हो रही हैं। मंत्रालय ने स्वीकार किया कि आवाजाही के पूरी तरह सामान्य होने में थोड़ा समय लगेगा, क्योंकि अभी भी बारूदी सुरंगों को हटाने और बड़े जहाजों के जमावड़े को निपटाने का काम बाकी है। हालांकि, आपूर्ति में रुकावट का सबसे बुरा दौर अब बीत चुका है। पेट्रोल और डीजल के मामले में, झटके का असर सीधे ग्राहकों पर नहीं पड़ने दिया गया, बल्कि सरकार ने इसे खुद संभाला। केंद्र सरकार ने 27 मार्च, 2026 को पेट्रोल और डीजल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती की। इसके तहत पेट्रोल पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज को 13 रुपए से घटाकर 3 रुपए और डीजल पर 10 रुपए से घटाकर शून्य कर दिया गया। इस कदम से सरकार को लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। इसके बावजूद, मार्केटिंग कंपनियों ने दो महीने से अधिक समय तक रिटेल कीमतें नहीं बढ़ाईं, जबकि कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर से भी ऊपर चली गई थीं और उन्हें रोजाना लगभग एक हजार करोड़ रुपए का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा था। जब कीमतों में बदलाव करना जरूरी हो गया, तो 15 मई को प्रति लीटर 3 रुपए की एक ही बार बढ़ोतरी की गई, जो किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के मुकाबले सबसे कम थी। संकट शुरू होने के समय से तुलना करें तो, भारत में पेट्रोल पंप की कीमतों में हुई बढ़ोतरी किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के मुकाबले सबसे कम रही है। भारत में पेट्रोल की कीमतों में कुल मिलाकर लगभग 7.5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई।एलपीजी का मामला सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी कामयाबी साबित हुआ। भारतीय रसोई तक पहुंचने वाली आधी से अधिक कुकिंग गैस खाड़ी देशों से आती थी, और आपूर्ति में रुकावट के कारण इसका एक बड़ा हिस्सा लगभग रातों-रात बंद हो गया। आपूर्ति में रुकावट के आठ दिनों के भीतर ही एलपीजी कंट्रोल ऑर्डर जारी किया गया। इसमें सभी रिफाइनरियों को प्रोपेन, ब्यूटेन, प्रोपलीन और ब्यूटीन स्ट्रीम्स का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक प्रोडक्शन करने का निर्देश दिया गया। मंत्रालय ने बताया, “सात दिनों के भीतर, घरेलू प्रोडक्शन 35,000 टन से बढ़कर 54,000 टन प्रतिदिन हो गया। यह मात्रा लगभग 30,000 मीट्रिक टन प्रतिदिन की बची हुई आयात की जरूरत से कहीं अधिक थी, जिससे कमी को काफी हद तक घरेलू प्रोडक्शन से ही पूरा कर लिया गया। जिन रिफाइनरियों में पहले कभी एलपीजी का प्रोडक्शन नहीं होता था, उन्हें इसके प्रोडक्शन के लिए तैयार किया गया।”
कीमत के मामले में भी ग्राहकों का ध्यान रखा गया। 14.2 किलो वाले सिलेंडर की इंपोर्ट-लिंक्ड लागत 1,600 रुपए से अधिक होने के बावजूद, किसी भी घर के लिए तय कीमत 942 रुपए ही रखी गई। वहीं, Prime Minister उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए रिफिल पर 300 रुपए का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर मिलने के बाद प्रभावी कीमत 642 रुपए रही। इस योजना के तहत 10.58 करोड़ से अधिक कनेक्शन दिए गए हैं और यह एक आम घर की सालाना जरूरत को पूरा करती है। 7 जून को घरेलू कुकिंग गैस (एलपीजी) की कीमतों में प्रति सिलेंडर सिर्फ 29 रुपए की बढ़ोतरी की गई थी। आपूर्ति की स्थिति बेहतर होने पर, सरकार ने 25 जून को कमर्शियल और बल्क एलपीजी पर लगी पाबंदियां हटा लीं और नॉन-डोमेस्टिक सप्लाई को संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया।
भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए सरकार ने कई रणनीतिक कदम उठाए। कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए 27 देशों से बढ़ाकर 41 देशों तक पहुंचना एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इसमें लीबिया, गैबॉन, इक्वेटोरियल गिनी और गुयाना जैसे नए आपूर्तिकर्ता शामिल हुए हैं। साथ ही, अमेरिका और रूस जैसे देशों से तेल की खरीद बढ़ाई गई है। यह विविधीकरण भारत को किसी एक क्षेत्र या देश पर निर्भरता कम करने में मदद करता है। हॉर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरने वाले कच्चे तेल की मात्रा को कम करने के लिए आयात मार्गों में बदलाव किया गया है। यह एक महत्वपूर्ण कदम है क्योंकि हॉर्मुज स्ट्रेट एक प्रमुख समुद्री मार्ग है और यहां किसी भी तरह का तनाव वैश्विक तेल आपूर्ति को प्रभावित कर सकता है।
आईएसपीआरएल (Indian Strategic Petroleum Reserves Limited) के तहत बनाए गए रणनीतिक भंडार में लगभग 5.33 मिलियन टन तेल का भंडारण है। यह भंडार लगभग तीन हफ्तों की जरूरत को पूरा करने की क्षमता रखता है। यह आपातकालीन स्थितियों में एक सुरक्षा कवच का काम करता है, जिससे सरकार को आपूर्ति में किसी भी रुकावट से निपटने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है। भारत उन कुछ देशों में से था जो हॉर्मुज स्ट्रेट से अपने कार्गो की आवाजाही जारी रख पाए, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि देश में पेट्रोलियम उत्पादों की कोई कमी न हो।
एथेनॉल ब्लेंडिंग को 20 प्रतिशत तक पहुंचाना एक और महत्वपूर्ण संरचनात्मक राहत है। इससे हर साल कच्चे तेल के आयात की भारी मात्रा की बचत होती है। एथेनॉल, जो कि एक नवीकरणीय ईंधन है, पेट्रोल में मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है। इससे न केवल आयात पर निर्भरता कम होती है, बल्कि पर्यावरण को भी फायदा होता है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट भी भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत है। मध्य पूर्व संकट के पहले के स्तर के करीब, लगभग 74 डॉलर प्रति बैरल पर कीमतें आ गईं। स्ट्रेट से टैंकरों की आवाजाही फिर से शुरू होने के साथ कीमतें और कम होने की उम्मीद है। हालांकि, मंत्रालय ने यह भी कहा कि आवाजाही के पूरी तरह सामान्य होने में समय लगेगा, क्योंकि अभी भी बारूदी सुरंगों को हटाने और बड़े जहाजों के जमावड़े को निपटाने का काम बाकी है। लेकिन, आपूर्ति में रुकावट का सबसे बुरा दौर अब बीत चुका है।
पेट्रोल और डीजल के मामले में, सरकार ने ग्राहकों को सीधे तौर पर झटके का असर महसूस नहीं होने दिया। इसके लिए, केंद्र सरकार ने 27 मार्च, 2026 को पेट्रोल और डीजल पर सेंट्रल एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपए प्रति लीटर की कटौती की। पेट्रोल पर स्पेशल एडिशनल एक्साइज को 13 रुपए से घटाकर 3 रुपए और डीजल पर 10 रुपए से घटाकर शून्य कर दिया गया। इस फैसले से सरकार को लगभग 1.7 लाख करोड़ रुपए के राजस्व का नुकसान हुआ। इसके बावजूद, तेल मार्केटिंग कंपनियों ने दो महीने से अधिक समय तक रिटेल कीमतें नहीं बढ़ाईं। यह तब हुआ जब कच्चे तेल की कीमतें 120 डॉलर से भी ऊपर चली गई थीं और उन्हें रोजाना लगभग एक हजार करोड़ रुपए का नुकसान (अंडर-रिकवरी) हो रहा था। जब कीमतों में बदलाव करना अनिवार्य हो गया, तो 15 मई को प्रति लीटर 3 रुपए की एक ही बार बढ़ोतरी की गई। यह बढ़ोतरी किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के मुकाबले सबसे कम थी। संकट शुरू होने के समय से तुलना करें तो, भारत में पेट्रोल पंप की कीमतों में हुई बढ़ोतरी किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था के मुकाबले सबसे कम रही है। भारत में पेट्रोल की कीमतों में कुल मिलाकर लगभग 7.5 रुपए प्रति लीटर की बढ़ोतरी हुई।
एलपीजी का मामला सबसे बड़ी चुनौती और सबसे बड़ी कामयाबी साबित हुआ। भारतीय रसोई तक पहुंचने वाली आधी से अधिक कुकिंग गैस खाड़ी देशों से आती थी, और आपूर्ति में रुकावट के कारण इसका एक बड़ा हिस्सा लगभग रातों-रात बंद हो गया। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए, आपूर्ति में रुकावट के आठ दिनों के भीतर ही एलपीजी कंट्रोल ऑर्डर जारी किया गया। इस आदेश के तहत, सभी रिफाइनरियों को प्रोपेन, ब्यूटेन, प्रोपलीन और ब्यूटीन स्ट्रीम्स का इस्तेमाल करके अधिक से अधिक एलपीजी का उत्पादन करने का निर्देश दिया गया। मंत्रालय ने बताया, “सात दिनों के भीतर, घरेलू प्रोडक्शन 35,000 टन से बढ़कर 54,000 टन प्रतिदिन हो गया। यह मात्रा लगभग 30,000 मीट्रिक टन प्रतिदिन की बची हुई आयात की जरूरत से कहीं अधिक थी, जिससे कमी को काफी हद तक घरेलू प्रोडक्शन से ही पूरा कर लिया गया। जिन रिफाइनरियों में पहले कभी एलपीजी का प्रोडक्शन नहीं होता था, उन्हें इसके प्रोडक्शन के लिए तैयार किया गया।”
कीमत के मामले में भी ग्राहकों को राहत दी गई। 14.2 किलो वाले एलपीजी सिलेंडर की इंपोर्ट-लिंक्ड लागत 1,600 रुपए से अधिक होने के बावजूद, किसी भी घर के लिए तय कीमत 942 रुपए ही रखी गई। यह सरकार की सब्सिडी नीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वहीं, Prime Minister उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों के लिए रिफिल पर 300 रुपए का डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर मिलने के बाद प्रभावी कीमत 642 रुपए रही। इस योजना के तहत 10.58 करोड़ से अधिक कनेक्शन दिए गए हैं और यह एक आम घर की सालाना जरूरत को पूरा करती है। 7 जून को घरेलू कुकिंग गैस (एलपीजी) की कीमतों में प्रति सिलेंडर सिर्फ 29 रुपए की बढ़ोतरी की गई थी, जो कि एक मामूली वृद्धि थी।
आपूर्ति की स्थिति बेहतर होने पर, सरकार ने 25 जून को कमर्शियल और बल्क एलपीजी पर लगी पाबंदियां हटा लीं। इससे नॉन-डोमेस्टिक सप्लाई को संकट से पहले के स्तर पर बहाल कर दिया गया। यह कदम व्यवसायों और उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण था, क्योंकि वे एलपीजी पर काफी हद तक निर्भर करते हैं। कुल मिलाकर, भारत ने मध्य पूर्व तनाव के दौरान अपनी ऊर्जा सुरक्षा को बनाए रखने में एक मजबूत और प्रभावी रणनीति का प्रदर्शन किया है, जिसमें इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, आपूर्ति स्रोतों का विविधीकरण, रणनीतिक भंडार का उपयोग और ग्राहकों को राहत देने वाले उपाय शामिल हैं।