केरल को पीएम श्री योजना से बाहर निकलने का कानूनी विकल्प नहीं, शिक्षा मंत्री ने पिछली सरकार पर साधा निशाना

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Navbharat Times
केरल विधानसभा में सोमवार को पीएम श्री स्कूल डेवलपमेंट स्कीम को लेकर गरमागरम बहस हुई। राज्य के सामान्य शिक्षा मंत्री एन. शमसुद्दीन ने साफ कर दिया कि केरल के पास इस योजना से पीछे हटने का कोई कानूनी रास्ता नहीं है। उन्होंने पिछली एलडीएफ सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने बिना सोचे-समझे एक ऐसा समझौता कर लिया, जिससे अब राज्य के हाथ बंध गए हैं। मंत्री ने कहा कि केंद्र सरकार के साथ हुए समझौते के तहत केवल केंद्र ही इसे एकतरफा रद्द कर सकता है, इसलिए राज्य के पास इससे बाहर निकलने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

मंत्री शमसुद्दीन ने विधानसभा में बताया कि पिछली सरकार ने यह समझौता इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि अगर वे ऐसा नहीं करते तो केंद्र से मिलने वाली बड़ी आर्थिक मदद हाथ से निकल जाएगी। उन्होंने कहा, "आज इस योजना को लेकर राजनीतिक मतभेद होने के बावजूद, राज्य के लिए इससे बाहर निकलना मुमकिन नहीं है।" मंत्री के मुताबिक, अगर केरल पीएम श्री योजना से बाहर निकलता है, तो उसे करीब 2,000 करोड़ रुपये का भारी नुकसान होगा। उन्होंने यह भी बताया कि पीएम श्री प्रोग्राम के तहत 152 ब्लॉक में चुने गए 304 सरकारी स्कूलों के विकास के लिए तय लगभग 1,000 करोड़ रुपये तो जाएंगे ही, साथ ही राज्य को 'समग्र शिक्षा' योजना के तहत मिलने वाले 1,151.48 करोड़ रुपये भी हाथ से निकल सकते हैं।
मंत्री ने सदन को आगाह किया, "केंद्र ने पहले भी केरल का वाजिब फंड रोका है। पूरी संभावना है कि अगर राज्य समझौते से पीछे हटता है, तो दूसरी ग्रांट पर भी असर पड़ सकता है।" शिक्षा मंत्री एन. शमसुद्दीन ने फिर से दोहराया कि पिछली एलडीएफ सरकार ने यह समझौता इसलिए किया था क्योंकि उन्हें डर था कि कहीं केंद्र से मिलने वाला दूसरा फंड भी न रुक जाए। उन्होंने आरोप लगाया कि योजना के दूरगामी असर होने के बावजूद, समझौता करने से पहले कोई खास बातचीत नहीं हुई थी।

"रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे पता चले कि पिछली सरकार ने समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) के साथ चर्चा की हो या कोई तैयारी की हो," मंत्री ने कहा। उन्होंने यह भी बताया कि योजना की जांच के लिए एलडीएफ सरकार द्वारा बनाई गई मंत्री-स्तरीय सब-कमेटी की एक बार भी बैठक नहीं हुई। शमसुद्दीन ने पीएम श्री योजना के कुछ प्रावधानों, खासकर पाठ्यक्रम और एकेडमिक आजादी (शैक्षणिक स्वतंत्रता) से जुड़े प्रावधानों पर यूडीएफ सरकार की आपत्तियों को भी सामने रखा।

"स्कूलों में क्या पढ़ाया जाए, यह राज्य का अधिकार होना चाहिए। ऐसे मुद्दों पर किसी पक्के समझौते में शामिल होने से पहले व्यापक बातचीत की जरूरत थी," मंत्री ने कहा। उन्होंने कहा कि मौजूदा सरकार को पिछली सरकार के फैसलों के नतीजे भुगतने पड़ रहे हैं। अब सरकार केंद्र से मिलने वाली जरूरी मदद को गंवाए बिना केरल के हितों की रक्षा के तरीके तलाश रही है।

शम्सुद्दीन ने भरोसा दिलाया, "इस स्कीम को लेकर हमारे राजनीतिक मतभेद चाहे जो भी हों, हम यह पक्का करेंगे कि केरल के पब्लिक एजुकेशन सेक्टर (सार्वजनिक शिक्षा क्षेत्र) को मिलने वाला एक भी रुपया बर्बाद न हो। हमारी प्राथमिकता केंद्र से मिलने वाली हर जायज ग्रांट हासिल करना और उसका इस्तेमाल सरकारी स्कूलों को मजबूत करने के लिए करना है।"

विधानसभा में मंत्री का यह बयान सुनने के बाद, पूर्व शिक्षा मंत्री और सीपीआई (एम) के वरिष्ठ नेता वी. शिवनकुट्टी ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस पार्टी पर निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि इन पार्टियों ने एक ऐसी स्कीम लागू की, जिसे पिछली वामपंथी सरकार ने राज्य की शैक्षिक स्वायत्तता के लिए संभावित खतरों को देखते हुए रोक दिया था।

पीएम श्री स्कूल डेवलपमेंट स्कीम, जैसा कि नाम से पता चलता है, केंद्र सरकार की एक योजना है जिसका मकसद देश भर के सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाना है। इस योजना के तहत स्कूलों को आधुनिक सुविधाएं, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर और नई शिक्षण पद्धतियां दी जानी हैं। लेकिन, इस योजना के कुछ प्रावधानों को लेकर केरल सरकार की चिंताएं हैं, खासकर पाठ्यक्रम और शैक्षणिक स्वतंत्रता को लेकर।

मंत्री शमसुद्दीन ने साफ किया कि केरल सरकार इस योजना से पूरी तरह खुश नहीं है, लेकिन आर्थिक मजबूरी के चलते वे इससे पीछे नहीं हट सकते। उन्होंने कहा कि पिछली एलडीएफ सरकार ने बिना सोचे-समझे यह समझौता कर लिया था। यह समझौता एकतरफा था, जिसका मतलब है कि सिर्फ केंद्र सरकार ही इसे खत्म कर सकती है। राज्य के पास ऐसा करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।

इस योजना से हटने पर केरल को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा। यह नुकसान सिर्फ पीएम श्री योजना के तहत मिलने वाले फंड तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि 'समग्र शिक्षा' जैसी दूसरी महत्वपूर्ण योजनाओं के फंड पर भी असर पड़ सकता है। मंत्री ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार पहले भी केरल का फंड रोक चुकी है, इसलिए अगर वे इस समझौते से पीछे हटते हैं तो और भी मुश्किलें आ सकती हैं।

मंत्री ने पिछली सरकार पर आरोप लगाया कि उन्होंने हितधारकों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया। यहां तक कि योजना की जांच के लिए बनी मंत्री-स्तरीय सब-कमेटी की भी एक बार बैठक नहीं हुई। यह दर्शाता है कि समझौता जल्दबाजी में किया गया था।

केरल सरकार की मुख्य चिंता यह है कि स्कूलों में क्या पढ़ाया जाए, यह राज्य का अधिकार होना चाहिए। पीएम श्री योजना के कुछ प्रावधान इस अधिकार में दखल दे सकते हैं। इसलिए, मंत्री ने कहा कि ऐसे किसी भी समझौते पर हस्ताक्षर करने से पहले व्यापक बातचीत होनी चाहिए थी।

फिलहाल, केरल सरकार पिछली सरकार के फैसलों के नतीजों से जूझ रही है। वे ऐसे तरीके ढूंढ रहे हैं जिससे राज्य के हितों की रक्षा हो सके और साथ ही केंद्र से मिलने वाली आर्थिक मदद भी न रुके। मंत्री ने वादा किया कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि केरल के सरकारी स्कूलों को मिलने वाला कोई भी पैसा बर्बाद न हो। उनकी पहली प्राथमिकता केंद्र से मिलने वाली हर जायज ग्रांट हासिल करना और उसका इस्तेमाल सरकारी स्कूलों को मजबूत बनाने में करना है।

इस पूरे मामले पर सीपीआई (एम) के नेता वी. शिवनकुट्टी ने मुस्लिम लीग और कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि इन पार्टियों ने ऐसी योजना को लागू करवाया, जिसे पिछली वामपंथी सरकार ने राज्य की शैक्षिक स्वायत्तता के लिए खतरा मानते हुए रोक दिया था। यह बयानबाजी इस बात को दर्शाती है कि इस मुद्दे पर राजनीतिक मतभेद भी काफी गहरे हैं।