राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने मुहाना थाने में 16 वर्षीय ऋतुराज की मौत की जांच के आदेश दिए
राजस्थान मानवाधिकार आयोग ने मुहाना थाने में 16 वर्षीय ऋतुराज की मौत की जांच के आदेश दिए
NewsPoint•
राजस्थान के जयपुर के मुहाना थाने से जुड़े 16 वर्षीय ऋतुराज लोहार की इलाज के दौरान मौत के मामले में मानवाधिकार आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है। ऋतुराज के परिवार ने पुलिस पर आरोप लगाया है कि पुलिस ने हिरासत में उसकी पिटाई की थी, जबकि पुलिस ने इन आरोपों को ख़ारिज कर दिया है। अब आयोग ने मामले की जांच का आदेश दिया है। इस मामले की जांच आईजी हिंगलाजदान और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. संध्या यादव करेंगे।
ऋतुराज का परिवार कहता है कि युवक को पुलिस ने पूछताछ के लिए बुलाया था। इसके बाद उसकी हालत बिगड़ गई और उसे अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। वह करीब 11 दिन तक आईसीयू में रहा। अंततः उसकी मौत हो गई। परिवार ने कहा कि ऋतुराज के शरीर पर चोटों के निशान थे। लेकिन पुलिस ने कहा कि इन आरोपों में कोई सच्चाई नहीं है। अब मानवाधिकार आयोग ने मामले की पूरी जांच करवाने का फैसला लिया है ताकि यह पता चल सके कि असल में क्या हुआ था।राज्य मानवाधिकार आयोग ने मुहाना थाने के उस समय के CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया है, जब ऋतुराज थाने में था। आयोग ने फुटेज को सील करके छोटे टुकड़ों में सुरक्षित रखने और जांच के लिए उपलब्ध कराने को कहा है। CCTV फुटेज से यह जानने में मदद मिलेगी कि ऋतुराज थाने में कब आया, उसकी गतिविधियां क्या थीं, और उसकी तबीयत बिगड़ने से पहले क्या घटनाक्रम हुआ।
आयोग ने अपने स्तर पर जांच की जिम्मेदारी आईजी हिंगलाजदान और अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक डॉ. संध्या यादव को सौंपी है। यह दोनों अधिकारी घटना के गवाहों के बयान लेंगे और उन डॉक्टरों से जानकारी प्राप्त करेंगे जिन्होंने ऋतुराज का इलाज किया था। जांच में मेडिकल रिकॉर्ड, पोस्टमार्टम रिपोर्ट, CCTV फुटेज, और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान भी शामिल होंगे। आयोग ने संबंधित अधिकारियों से समय पर स्थिति रिपोर्ट भी पेश करने को कहा है।
इस मामले में मजिस्ट्रियल जांच भी शुरू कर दी गई है। इसमें परिवार के आरोपों के बाद न्यायिक मजिस्ट्रेट ने परिजनों के बयान दर्ज किए। इसके बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुसार, पांच डॉक्टरों के पैनल ने शव का पोस्टमार्टम किया। अब मानवाधिकार आयोग की जांच से यह स्पष्ट करने की कोशिश की जाएगी कि युवक की तबीयत बिगड़ने और उसकी मौत के कारण क्या थे तथा क्या पुलिस हिरासत में कोई भूमिका थी।
जब हम इस मामले को देखते हैं, तो यह पता चलता है कि किस प्रकार पुलिस और मानवाधिकार आयोग एक दूसरे के आमने-सामने हैं। इधर एक परिवार को न्याय की उम्मीद है और उधर कानून व्यवस्था की सतह पर स्थिति को संभालने की कोशिश हो रही है। अंततः जांच पूरी होने के बाद ही आरोपों की सच्चाई बाहर आएगी।
यह मामला सिर्फ एक युवक की मौत का नहीं, बल्कि यह मानवाधिकारों और कानून व्यवस्था का भी है। यह निश्चित रूप से उन लोगों के लिए महत्वपूर्ण है जो न्याय की तलाश में लगे हैं। केवल समय ही बताएगा कि इस जांच के परिणाम क्या होते हैं।