सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिव्यांग बच्चों के रिहैबिलिटेशन सेंटर्स के नियमन पर दिशा-निर्देश दिए

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Navbharat Times
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दिव्यांग बच्चों के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर्स और अन्य संस्थाओं के रेगुलेशन, रजिस्ट्रेशन और निगरानी के लिए राज्यवार जानकारी इकट्ठा करके रिकॉर्ड पर रखने का आदेश दिया है। यह निर्देश गुरुवार को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाले बेंच द्वारा दिव्यांगों और बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले वकील राहुल बजाज और जहीर अब्बास जान द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) की सुनवाई के दौरान जारी किया गया।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। बेंच ने कहा कि केंद्र सरकार सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों (UT) के साथ मिलकर काम करे। इसकी मुख्य वजह यह है कि ऐसे संस्थानों को नियंत्रित करने के लिए कानूनी सुरक्षा उपाय लागू होने की प्रक्रिया के बारे में विस्तृत डेटा तैयार किया जा सके।
सीजेआई सूर्यकांत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह एक हलफनामे के माध्यम से ‘दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPWD), 2016’ के तहत वैधानिक प्राधिकरणों की स्थापना और कामकाज, मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों के न्यूनतम मानकों को तय करने और उनकी अधिसूचना के बारे में जानकारी रिकॉर्ड पर रखे।

सुनवाई के दौरान, वकील राहुल बजाज ने बताया कि दिव्यांग बच्चों के लिए रिहैबिलिटेशन सेंटर्स का राज्य स्तर पर आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम के तहत अनिवार्य रजिस्ट्रेशन कराना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि यह आवश्यक है कि यह पता लगाया जाए कि सभी राज्यों में तय कानूनी प्राधिकरण स्थापित हुए हैं या नहीं और क्या वे अपने निगरानी कार्यों को सही से निभा रहे हैं।

बाज ने बताया कि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 के अनुसार, अभी तक केवल 10 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों के लिए न्यूनतम मानकों के बारे में नोटिफिकेशन जारी किया है। उनकी चिंताओं को सुनते हुए, बेंच ने निर्देश दिया कि केंद्र सरकार राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासन के साथ तालमेल बनाकर जानकारी सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करे।

इस मामले की अगली सुनवाई 22 अक्टूबर को होगी। याचिका में RPWD एक्ट, रिहैबिलिटेशन काउंसिल ऑफ इंडिया (RCI) एक्ट, 1992 और मेंटल हेल्थकेयर एक्ट के तहत कानूनी सुरक्षा उपायों के लागू करने में प्रणाली की कमजोरियों की ओर इशारा किया गया है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मौजूदा कानूनी ढांचे के बावजूद, दिव्यांग बच्चों को विभिन्न समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इनमें गैर-पंजीकृत संस्थानों का कार्य करना, अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, योग्य पेशेवरों की कमी और प्रभावी निगरानी का न होना शामिल है।

उन्होंने तर्क किया कि दिव्यांग व्यक्तियों को सुविधाएं देने वाले संस्थानों का RPWD एक्ट की धारा 50 के तहत रजिस्ट्रेशन होना अनिवार्य है। यह धारा किसी भी व्यक्ति को बिना सक्षम अधिकारी से रजिस्ट्रेशन सर्टिफिकेट लिए ऐसा संस्थान शुरू करने या चलाने से रोकती है। याचिका में कहा गया है कि दिव्यांग व्यक्तियों के लिए काम करने वाले कई संस्थान कानून के तहत रजिस्टर्ड नहीं हैं। इससे उनकी सही निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हो पाती।

याचिका में ‘मेंटल हेल्थकेयर एक्ट’ को लागू करने को लेकर भी चिंता जताई गई है। इसमें यह कहा गया है कि यह कानून राज्य मानसिक स्वास्थ्य प्राधिकरणों और मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए न्यूनतम गुणवत्ता मानकों की स्थापना के बारे में है। याचिकाकर्ताओं ने 2025 में श्रीनगर की चाइल्ड वेलफेयर कमिटी द्वारा एक चाइल्ड डेवलपमेंट सेंटर के अचानक किए गए निरीक्षण के परिणामों का उल्लेख किया।

याचिका के अनुसार, उस संस्थान के पास RPWD एक्ट और RCI एक्ट के तहत रजिस्ट्रेशन नहीं था। वहां बुनियादी सुविधाओं, योग्य कर्मचारियों और प्रोग्रामों को सही से लागू करने की कमी थी।

याचिकाकर्ताओं ने दिव्यांग बच्चों के लिए रिहैबिलिटेशन और मानसिक स्वास्थ्य सुविधाओं के रजिस्ट्रेशन, रेगुलेशन और मॉनिटरिंग से जुड़े कानूनी प्रावधानों को प्रभावी ढंग से लागू करने की मांग की है।