उच्चाधिकार समिति का राजस्थान दौरा: अरावली पर्वत श्रृंखला का अध्ययन और संरक्षण
उच्चाधिकार समिति का राजस्थान दौरा: अरावली पर्वत श्रृंखला का अध्ययन और संरक्षण
NewsPoint•
सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित उच्चाधिकार समिति (एचपीसी) 11 से 13 अक्टूबर तक राजस्थान के वागड़ क्षेत्र का दौरा करने वाली है। यह समिति अरावली पर्वत श्रृंखला की परिभाषा, पारिस्थितिक स्थिति और संरक्षण के मुद्दों का अध्ययन करेगी। डूंगरपुर के पालदेवल-सरकान और बांसवाड़ा के केवड़िया-कोठारा क्षेत्र का निरीक्षण करके खनन, भूमि उपयोग और स्थानीय आदिवासी समुदायों की आजीविका पर प्रभाव का आकलन करेगी। यह दौरा गुजरात के अरावली क्षेत्र के दौरे के बाद हो रहा है, जिसका उद्देश्य जमीनी हकीकतों का अन्वेषण करना है। समिति अपनी रिपोर्ट 30 नवंबर तक सुप्रीम कोर्ट को सौंपेगी।
उच्चाधिकार समिति का कार्य अरावली पर्वतमाला की पूर्व-निर्धारित परिभाषा को समझना और उसकी सीमांकन प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप से जांचना है। यह समिति भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद (आईसीएफआरई) के महानिदेशक की अध्यक्षता में बनाई गई है। इससे पहले, समिति ने राजस्थान में पांच दिनों का दौरा किया था, जहां उसने कई स्थानों का निरीक्षण किया और वहां के हितधारकों से मुलाकात की थी। यह उच्चाधिकार समिति विशेष रूप से उन क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित कर रही है, जहां अरावली भूदृश्य, वन पारिस्थितिकी, खनन गतिविधियां और स्थानीय जीविका का संबंध बेहद महत्वपूर्ण है।राजस्थान सरकार ने इसकी यात्रा की तैयारी में वन विभाग और स्थानीय क्षेत्र के अधिकारियों को सक्रिय कर दिया है। इस कार्य में, डूंगरपुर और बांसवाड़ा के उप वन संरक्षक (डीसीएफ) और अन्य क्षेत्र कर्मचारी समिति के साथ रहेंगे। एक वरिष्ठ अधिकारी क्षेत्र समन्वयक के रूप में कार्य करेगा। यह सब व्यवस्था समिति के स्थल निरीक्षण को आसान बनाने और स्थानीय निवासियों के साथ संवाद स्थापित करने के लिए की गई है।
इस दौरे का महत्व इसलिए भी है क्योंकि समिति की रिपोर्ट उन स्थानीय निवासियों की आवाज़ को सुनने का प्रयास करेगी, जो अरावली क्षेत्र से निकटता से जुड़े हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने 7 सितंबर के आदेश में स्पष्ट किया था कि समिति को सभी संबंधित हितधारकों, विशेष रूप से आदिवासी समुदायों, को अपने विचार व्यक्त करने के लिए उचित अवसर देना होगा। यह महत्वपूर्ण है कि समिति इन दृष्टिकोणों को अपने अंतिम मूल्यांकन में शामिल करे।
समिति के पर्यवेक्षण में कई मापदंडों की जांच की जाएगी। इसमें खनन और उत्खनन गतिविधियां, वन आवरण, जल स्रोत और आसपास की पारिस्थितिक स्थिति शामिल हैं। इसके साथ ही, मौजूदा भूमि उपयोग के तरीके और उनके पर्यावरणीय प्रभाव का भी आकलन किया जाएगा। इससे न केवल क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर प्रभाव पैदा होगा, बल्कि स्थानीय निवासियों और आदिवासी आजीविका के लिए भी संभावित समस्याएं पैदा हो सकती हैं।
समिति की यात्रा के दौरान, 11 अक्टूबर को डूंगरपुर जिले के पालदेवल-सरकान क्षेत्र का निरीक्षण किया जाएगा। इस क्षेत्र में निरीक्षण के बाद हितधारकों के साथ चर्चा होगी। अगले दिन, 12 अक्टूबर को, बांसवाड़ा जिले के केवड़िया-कोठारा क्षेत्र का आकलन किया जाएगा, जहां फिर से स्थानीय समुदायों और अन्य हितधारकों के साथ बातचीत होगी। 13 अक्टूबर को समिति का यह दौरा समाप्त होगा।
इन निरीक्षणों से समिति को क्षेत्र की पर्यावरणीय और आर्थिक स्थितियों की स्पष्ट समझ मिलने की उम्मीद है। विशेषकर खनन से जुड़ी चिंताओं और उन समुदायों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं का आकलन होगा, जो इसके प्रभाव में आते हैं। समिति की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में विचार के लिए प्रस्तुत की जाएगी और इससे अरावली पहाड़ियों के निर्धारण, सीमांकन और संरक्षण संबंधी बिंदुओं पर संपूर्ण मूल्यांकन किया जा सकेगा।
समिति के लिए यह दौरा महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह न केवल स्थानीय पर्यावरणीय मुद्दों को पहचानने में मदद करेगा, बल्कि आदिवासी समुदायों की चिंता को भी उजागर करेगा। इस निष्कर्ष की अपेक्षा की जा रही है कि इससे अरावली क्षेत्र में प्रभावी और सतत विकास की कोई नई दिशा मिलेगी। स्थानीय लोगों की आवाज़ सुनकर और उनकी समस्याओं को समझकर ही सही समाधान निकाला जा सकेगा।