भारत की प्रतिक्रिया: अमेरिका के पीईआरएम कार्यक्रम पर रोक से 30 लाख विदेशी कर्मचारियों पर असर

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भारत ने शुक्रवार को अमेरिकी प्रशासन के उस फैसले की जानकारी दी, जिसमें कुछ कंपनियों के लिए 'परमानेंट लेबर सर्टिफिकेशन' (पीईआरएम) कार्यक्रम को निलंबित कर दिया गया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने साफ किया है कि पीईआरएम आवेदन प्रक्रिया को रोकने से मौजूदा एच-1बी वीजा धारकों और उनके आश्रितों की स्थिति प्रभावित नहीं होगी। हालाँकि, यह निर्णय उन कर्मचारियों पर असर डाल सकता है, जो स्थायी निवास या ग्रीन कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया में हैं। मंत्रालय ने कहा कि अमेरिका द्वारा उठाए गए ये कदम भारत और अमेरिका के बीच के संबंधों में कोई सहारा नहीं देते और ये दोनों देशों की साझा आकांक्षाओं के खिलाफ हैं।

विदेश मंत्रालय ने एक बयान में कहा, “हम कुछ कंपनियों के लिए अमेरिकी श्रम विभाग के पीईआरएम कार्यक्रम पर लिए गए फैसले से अवगत हैं। यह समझना जरूरी है कि पीईआरएम, एच-1बी वीजा कार्यक्रम से अलग है। पीईआरएम आवेदनों के निलंबन से अपने आप मौजूदा एच-1बी वीजा या एच-1बी धारकों और उनके परिवारों की कानूनी स्थिति प्रभावित नहीं होती। हालांकि, इससे प्रभावित कंपनियों के योग्य कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर कुछ असर पड़ सकता है।”
मंत्रालय ने बताया कि प्रतिभाओं की आवाजाही (टैलेंट मोबिलिटी) दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी है। यह भारतीयों के लिए नए अवसर पैदा करती है और अमेरिकी कंपनियों को अत्यधिक कौशल वाले पेशेवरों और नवाचार में मदद करती है। इससे अमेरिका के शेयरधारकों को भी लाभ मिलता है। भारत ने स्पष्ट किया कि इस प्रक्रिया से जुड़े सभी पक्षों को इसे समझना चाहिए।

भारत ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस की टिप्पणियों की भी आलोचना की और उन्हें 'अनावश्यक' बताया। मंत्रालय ने कहा, “हमने अमेरिकी उपराष्ट्रपति की कुछ टिप्पणियां भी देखी हैं। हमारा मानना है कि इस तरह के बयान अनुचित हैं और इस तथ्य को नजरअंदाज करते हैं कि अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल लोग हैं, जो वहां की अर्थव्यवस्था और नवाचार तंत्र में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।”

भारत ने अमेरिका में प्रवासियों के ऐतिहासिक योगदान पर भी जोर दिया। मंत्रालय ने कहा, “खुद अमेरिका का इतिहास भी ऐसे प्रवासियों की कई पीढ़ियों से जुड़ा है, जिनके श्रम, उद्यम और नवाचार ने देश की समृद्धि और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।”

हाल ही में अमेरिकी प्रशासन ने भारत की इन्फोसिस, टाटा, विप्रो, एचसीएल सहित कई बड़ी टेक कंपनियों के लिए पीईआरएम प्रक्रिया को निलंबित करने का निर्णय लिया। अमेरिका के श्रम मंत्री कीथ सोंडरलिंग ने इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि यह कार्रवाई चल रही आपराधिक और संघीय जांचों के आधार पर की गई है। उन्होंने कहा, “श्रम विभाग के इंस्पेक्टर जनरल एंथनी डीएस्पोसिटो की अगुवाई में चल रही जांच के कारण मैंने दुनिया की कुछ सबसे बड़ी आईटी आउटसोर्सिंग कंपनियों को पीईआरएम कार्यक्रम से निलंबित कर दिया है।”

सोंडरलिंग ने यह भी उल्लेख किया कि माइक्रोसॉफ्ट और एडोब को भी कई संघीय जांचों के चलते इस कार्रवाई में शामिल किया गया है। उन्होंने कहा, “हम इन कंपनियों से जुड़े किसी भी नए या लंबित पीईआरएम आवेदन को स्वीकार या प्रोसेस नहीं करेंगे।”

पीईआरएम कार्यक्रम उन नियोक्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जो विदेशी कर्मचारियों के लिए रोजगार आधारित स्थायी निवास (ग्रीन कार्ड) प्राप्त करना चाहते हैं। सोंडरलिंग के अनुसार, जिन कंपनियों पर कार्रवाई की गई है, उन्होंने 2009 से अब तक सामूहिक रूप से लगभग 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए आवेदन किए थे। इन कंपनियों को 2.3 लाख से अधिक एच-1बी वीजा मंजूरी और एक लाख से अधिक स्थायी श्रम प्रमाणन प्राप्त हुए थे।

जेडी वेंस ने आरोप लगाया कि कुछ कंपनियां एच-1बी कार्यक्रम का उपयोग कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को रखकर अमेरिकी कामकाजी लोगों की जगह भरने के लिए कर रही हैं। उन्होंने कहा, “एच-1बी वीजा कार्यक्रम का उद्देश्य कंपनियों को ऐसे सर्वश्रेष्ठ वैश्विक प्रतिभाशाली लोगों को नियुक्त करने की अनुमति देना है, जिन पदों को अमेरिकी कर्मचारियों से भरना संभव नहीं है।”

वेंस ने माइक्रोसॉफ्ट के उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि कंपनी ने 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, जबकि उसे 6,300 एच-1बी वीजा और लगभग 3,000 ग्रीन कार्ड मिले। उन्होंने कहा कि प्रशासन का उद्देश्य कंपनियों को अमेरिकी बाजार छोड़ने के लिए मजबूर करना नहीं, बल्कि उनकी भर्ती नीतियों में बदलाव लाना है। जब उनसे पूछा गया कि पीईआरएम पर रोक अस्थायी है या स्थायी, तो उन्होंने कहा, “यह निलंबन उतने समय तक जारी रहेगा, जितने समय तक इसकी जरूरत होगी।”

उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन के पास इस निलंबन को लंबे समय तक जारी रखने के लिए पर्याप्त अधिकार हैं, लेकिन उनका उद्देश्य कंपनियों के व्यवहार में सुधार लाना है। भारत ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है और इस मुद्दे पर अमेरिकी प्रशासन के कार्यों पर नजर बनाए हुए है।

इस पूरी स्थिति ने दोनों देशों के बीच की आर्थिक साझेदारी पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत की यह प्रतिक्रिया अमेरिकी प्रशासन के निर्णय के बाद आई है, जो भारत की कंपनियों और वहां के कर्मचारियों को सीधे प्रभावित करती है।

भारत और अमेरिका के संबंधों को बेहतर बनाने के लिए जहां एक ओर दोनों सरकारों को मिलकर काम करने की जरूरत है, वहीं इस मामले पर धैर्य और समझदारी के साथ विचार भी जरूरी है। भारत ने यह सुनिश्चित करने का आश्वासन दिया है कि वह इस मामले की पूरी निगरानी करेगा और अपने नागरिकों के हितों की रक्षा करेगा।