महाकालेश्वर मंदिर में भस्म आरती: श्रद्धालुओं ने किए बाबा महाकाल के अलौकिक दर्शन

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Navbharat Times
उज्जैन, 3 सितंबर: गुरुवार को श्री महाकालेश्वर मंदिर में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि पर बाबा महाकाल की अलौकिक भस्म आरती हुई। इस खास मौके पर हजारों श्रद्धालु मंदिर में मौजूद रहे। तड़के भगवान वीरभद्र की आज्ञा लेने के बाद ढोल-नगाड़ों के साथ मंदिर के कपाट खोले गए। दिव्य श्रृंगार और भस्म आरती के बाद जब भक्तों ने बाबा के दर्शन किए तो पूरा मंदिर परिसर 'जय श्री महाकाल' के जयकारों से गूंज उठा। घंटियों, शंखध्वनि और मंत्रोच्चार से पूरा माहौल भक्तिमय हो गया।

महाकाल मंदिर के पट खुलते ही मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का जलाभिषेक किया गया। इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और फलों के रस से बने पंचामृत से उनका अभिषेक हुआ। बाबा महाकाल की पूजा के दौरान सबसे पहले घंटाल बजाकर हरिओम जल अर्पित किया गया। कपूर आरती के बाद बाबा ने मुकुट धारण किया। फिर झांझ-मंजीरे, ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ भस्म आरती की गई। बाबा को वैष्णव तिलक और राम नाम के बेल पत्र से सजाया गया। महाकाल मंदिर के पुजारी ने महाआरती संपन्न कराई।
भस्म आरती के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे थे। अपने प्यारे भगवान के दर्शन के लिए कई भक्त बीती रात से ही कतार में लगे थे। भस्म आरती के दौरान पुरुषों के लिए पारंपरिक धोती-सोला और महिलाओं के लिए साड़ी पहनना ज़रूरी था। यह परंपरा महानिर्वाणी अखाड़े की ओर से निभाई जाती है, जो बाबा महाकाल को भस्म आरती अर्पित करते हैं। ऐसा माना जाता है कि भस्म अर्पित होने के बाद बाबा महाकाल निराकार से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं। इस आरती में शामिल होने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु उज्जैन की पावन नगरी आते हैं।

बाबा महाकाल की भस्म आरती एक बहुत ही खास और अलौकिक अनुष्ठान है। यह भाद्रपद महीने के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को होती है। इस दिन मंदिर में सुबह तड़के ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। सबसे पहले भगवान वीरभद्र से आज्ञा ली जाती है, जो एक महत्वपूर्ण रस्म है। इसके बाद ढोल-नगाड़ों की गूंज के साथ मंदिर के मुख्य द्वार खोले जाते हैं।

श्रद्धालुओं के लिए यह एक बेहद खास पल होता है जब वे बाबा महाकाल का दिव्य श्रृंगार देखते हैं और फिर भस्म आरती में शामिल होते हैं। आरती के दौरान पूरा माहौल भक्ति और श्रद्धा से भर जाता है। 'जय श्री महाकाल' के नारे गूंजते हैं और घंटियों की आवाज़, शंखनाद और मंत्रों का उच्चारण कानों में पड़ता है।

महाकाल मंदिर के पुजारियों द्वारा विधि-विधान से पूजा की जाती है। इसमें जलाभिषेक, पंचामृत अभिषेक और अन्य कई रस्में शामिल होती हैं। कपूर आरती के बाद बाबा को मुकुट पहनाया जाता है। फिर असली भस्म आरती शुरू होती है, जिसमें ढोल-नगाड़े और शंखनाद के साथ बाबा को भस्म अर्पित की जाती है। बाबा को वैष्णव तिलक और बेल पत्र से सजाया जाता है, जो उनकी शोभा को और बढ़ाते हैं।

इस आरती में शामिल होने के लिए भक्तों को कुछ नियमों का पालन करना होता है। पुरुषों को धोती-सोला और महिलाओं को साड़ी पहनना अनिवार्य होता है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और महानिर्वाणी अखाड़े द्वारा निभाई जाती है। ऐसा माना जाता है कि भस्म आरती के बाद बाबा महाकाल अपने निराकार रूप से साकार रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं, जो एक अत्यंत शुभ और फलदायी अनुभव होता है। इसी मान्यता के कारण बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पावन अवसर पर उज्जैन आते हैं।