मणिपुर के श्रद्धालुओं के लिए राधा कुंड और शिव कुंड का विशेष धार्मिक महत्व

NewsPoint•
Navbharat Times
लखनऊ, 24 सितंबर। ब्रजभूमि और मणिपुर के बीच का धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध सदियों पुराना है। मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालु गोवर्धन के राधा कुंड और शिव कुंड जैसे स्थलों को केवल पूजा के लिए नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए भी महत्वपूर्ण मानते हैं। मणिपुर में लोगों के लिए पितृपक्ष जैसे पारंपरिक अवसरों पर पिंडदान और तर्पण का यह समारोह आज भी बड़े श्रद्धा से किया जाता है। यहाँ तक कि इस प्रथा का पालन कई पीढ़ियों से हो रहा है।

मणिपुर के लोग अपने पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के लिए राधा कुंड का विशेष महत्व देते हैं। वे इसे बिहार के गया जी की तरह पवित्र मानते हैं। यहाँ के पवित्र जल में तर्पण करने से भक्त मानते हैं कि उनके पूर्वजों को श्री राधा-कृष्ण के चरणों में स्थान मिलता है। इसके अलावा, गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित शिव कुंड, जहाँ भगवान शिव सिद्धेश्वर रूप में विराजमान हैं, का यहाँ के श्रद्धालुओं के लिए विशेष आध्यात्मिक महत्व है।
शास्त्रों में भगवान शिव को ‘वैष्णवानां यथा शंभु’ कहा गया है, जिसका मतलब है कि शिव वैष्णवों के परम गुरु हैं। इसी विश्वास के साथ मणिपुर के लोग अपने परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद उनकी अस्थियों को गंगाजी में विसर्जित करते हैं। इसके साथ ही, वे ब्रज के पवित्र स्थलों जैसे शिव कुंड और मानसी गंगा में भी अस्थियों का विसर्जन करते हैं। यहाँ पर लोगों का मानना है कि भगवान शिव की कृपा से दिवंगत आत्मा को पुनर्जन्म के चक्र से मुक्ति मिल जाती है।

18वीं शताब्दी में मणिपुर के राजा महाराज भाग्यचंद्र ने गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय को अपनाया। इसी समय से मणिपुर का ब्रज धाम से गहरा संबंध जुड़ गया। राधा कुंड में स्थित ‘गोपाल मणिपुरी मंदिर’ और प्राचीन समाधि स्थल इस ऐतिहासिक रिश्ते का सुबूत हैं। आज भी बहुत से श्रद्धालु अपने जीवन के अंतिम चरण में ब्रजवास करने और अपने पूर्वजों के लिए मोक्ष की कामना लेकर आते हैं।

स्थानीय निवासी दीपु जोशी बताते हैं, “मणिपुर के लोग इस स्थान पर अपने परिजनों की अस्थियों को लेकर आते हैं। यहां राधा रानी को चढ़ाते हैं और पीपल के पेड़ के नीचे गाड़कर चले जाते हैं। हम यह सब बचपन से ही देखते आ रहे हैं। जब से होश संभाला है, देखते आए हैं कि मणिपुर के लोग यहां ढोल-नगारों के साथ आकर यह सभी क्रिया करते हैं। पितृपक्ष में वे यहां जरूर आते हैं। उनका गया यहीं है। यहां पर श्राद्ध कुंड पर एक गया घाट भी बना हुआ है, वहां वे अपने पूर्वजों का श्राद्ध और तर्पण करते हैं।”

मणिपुर के तीर्थ पुरोहित भूपेंद्र गोस्वामी बताते हैं, “मणिपुर के लोग यहां राधा कुंड पर अपने पूर्वजों का पिंडदान और तर्पण करने के लिए आते हैं। लोग यहां अपनी परिजनों की अस्थियों को लेकर आते हैं और शिव कुंड में जाते हैं, जहां एक पीपल का पेड़ है। वहां अस्थियों को विसर्जित करने के बाद लोग राधा कुंड में स्नान करते हैं। इसके बाद वे ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। फिर वापस जाते हैं। यह प्रथा काफी पहले से चली आ रही है।”

गोदाधोर सिंह, जो मणिपुर से आए हैं, कहते हैं, “मणिपुर के ज्यादातर लोग यहीं आकर अपने परिजनों की अस्थियां विसर्जित करने के साथ-साथ पूर्वजों का पिंडदान करते हैं।”

इस तरह से मणिपुर और ब्रजभूमि के बीच का यह धार्मिक संबंध और परंपरा न केवल धार्मिक है, बल्कि लोगों के जीवन का एक अहम हिस्सा बन गई है। यहां की परंपराएं कई पीढ़ियों से चली आ रही हैं और आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाई जाती हैं।