मथुरा में पितृ पक्ष के दौरान मणipur के वैष्णव श्रद्धालुओं द्वारा पिंडदान की अनूठी परंपरा
मथुरा में पितृ पक्ष के दौरान मणipur के वैष्णव श्रद्धालुओं द्वारा पिंडदान की अनूठी परंपरा
NewsPoint•
मथुरा में पितृ पक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से हो रही है। यह हिंदू धर्म का 16 दिनों का एक पवित्र समय है, जो पूर्वजों की पूजा और उन्हें सम्मान देने के लिए आयोजित किया जाता है। इस समय में लोग खासकर पिंडदान, तर्पण और अन्य अनुष्ठान करते हैं। मथुरा में पिंडदान का महत्व यहां एक अद्भुत परंपरा से जुड़ा है, जिसमें मणिपुर के वैष्णव श्रद्धालुओं की एक गहरी आस्था है।
पितृ पक्ष के दौरान मथुरा, गयाजी, वाराणसी और हरिद्वार जैसे धार्मिक स्थलों पर लोग दूर-दूर से आते हैं। मणिपुर के वैष्णव यहां पिंडदान करते हैं, जो कि उनके पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है। मणिपुर और मथुरा का धार्मिक और सांस्कृतिक संबंध सदियों पुराना है। विशेष रूप से राधा कुंड और शिव कुंड, मणिपुर के श्रद्धालुओं के लिए बहुत पवित्र माने जाते हैं।मणिपुरी सड़कों पर राधा कुंड की एक अनोखी मान्यता है। उनके अनुसार, जब श्रद्धालु यहां तर्पण करते हैं, तो उन्हें लगता है कि उनके पूर्वज श्री राधा-कृष्ण के चरणों में स्थान प्राप्त कर रहे हैं। मणिपुर के लोग इसे अपने लिए पवित्र तीर्थ मानते हैं। इस विश्वास के मुताबिक, राधा कुंड के जल में तर्पण करने से आत्मा को शांति मिलती है। वहीं, गोवर्धन परिक्रमा मार्ग पर स्थित शिव कुंड भी मणिपुरी श्रद्धालुओं के लिए बड़ा अर्थ रखता है, क्योंकि शिव को वैष्णवों का गुरु माना जाता है।
मणिपुर के वैष्णव समाज में पितृ पक्ष का महत्व बहुत अधिक है। यहां, किसी भी परिवार में सदस्य के निधन के बाद, उनकी अस्थियों का कुछ हिस्सा गंगाजी और कुछ हिस्सा राधा कुंड या शिव कुंड में विसर्जित करने की परंपरा है। यह मान्यता है कि भगवान शिव की कृपा से दिवंगत आत्मा को मोक्ष मिलता है।
यह परंपरा 18वीं शताब्दी में मणिपुर के राजा महाराज भाग्यचंद्र के समय से शुरू हुई। उन्होंने गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय को अपनाया, जिससे मणिपुर का ब्रज धाम से एक गहरा रिश्ता बन गया। आज, मथुरा में राधा कुंड के पास ‘गोपाल मणिपुरी मंदिर’ और प्राचीन समाधि स्थल इस ऐतिहासिक रिश्ता को दर्शाते हैं। बड़ी संख्या में मणिपुर के श्रद्धालु अपने जीवन के अंतिम समय में मथुरा आकर अपने पूर्वजों की मोक्ष की कामना करते हैं।
स्थानीय नागरिक दीपू जोशी ने बताया कि मणिपुर से आने वाले लोग अपने परिवार के किसी सदस्य के निधन के बाद उनकी अस्थियों को राधा कुंड या शिव कुंड में लाते हैं। वे पीपल के पेड़ के नीचे अस्थियों को गाड़ते हैं और उसके बाद उसी पेड़ पर पीला कपड़ा बांधते हैं। दीपू ने कहा, "उन लोगों के लिए यही गयाजी होता है और राधाकुंड पर श्राद्ध करते हैं।"
तीर्थ पुरोहित भूपेंद्र गोस्वामी ने जानकारी दी कि मणिपुर के लोग राधाकुंड के पास आकर पिंडदान और तर्पण करते हैं। वे पीपल के पेड़ के पास अस्थियों को विसर्जित करते हैं। इसके बाद, वे राधाकुंड में स्नान करके मंदिर में ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। मणिपुर के निवासी गोदाधोर सिंह ने स्पष्ट किया कि परिवार के किसी सदस्य के निधन पर उनकी अस्थियों को मथुरा के राधाकुंड लाया जाता है। उन्होंने बताया, "कुछ लोग वाराणसी, प्रयागराज या हरिद्वार भी जाते हैं, लेकिन अधिकतर लोग राधाकुंड आकर पिंडदान करते हैं।"
पितृ पक्ष का यह समय मथुरा में न केवल धार्मिक अनुष्ठानों का समय है, बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं और आस्थाओं को भी एक साथ लाता है। मणिपुर से श्रद्धालु यहां आकर अपने पूर्वजों की आत्मा को शांति देने के लिए आस्था और श्रद्धा के साथ अनुष्ठान करते हैं। इस प्रकार, मथुरा का यह धार्मिक उत्सव न केवल स्थानीय लोगों के लिए, बल्कि मणिपुर के वैष्णवों के लिए भी एक महत्वपूर्ण और पवित्र अवसर है।