जब दुनिया में घटनाओं के कारण अनिश्चितता बढ़ती है, तो हम अक्सर बाहर समाधान तलाशना शुरू करते हैं। योग हमें सिखाता है कि जब बाहर की दुनिया हिल रही हो, तब अपने मन को स्थिर रखना सबसे जरूरी है। भगवद्गीता का ज्ञान भी किसी शांत जगह पर नहीं, युद्ध के मैदान में दिया गया था। इसका मतलब कि सच्ची समझ और बुद्धि मुश्किल समय में ही विकसित होती है। श्रीकृष्ण ने अर्जुन से यह नहीं कहा कि जीवन में संघर्ष खत्म हो जाएगा, बल्कि यह सिखाया कि मुश्किलों के बीच संतुलित कैसे रहना है।
आज की वैश्विक अशांति भी हमारे मन की स्थिति का ही प्रतिबिंब है। डर, असुरक्षा और लालच से प्रभावित होने पर फैसले जल्दबाजी व भावनाओं में लिए जाते हैं। लेकिन, जब मन शांत होता है, तो फैसलों के पीछे होती है समझदारी। महर्षि पतंजलि ने कहा है, ‘योग चित्त की वृत्तियों का शांत होना है।’ यानी जब मन शांत होगा, तभी सही सोच और शांति संभव है।
मुश्किल समय में हमारे मूल्यों की भी परीक्षा होती है। कई बार लोग सुरक्षा के नाम पर अपने सिद्धांतों से समझौता कर लेते हैं। लेकिन योग के सिद्धांत- सत्य, अहिंसा, संतोष व अनुशासन ऐसे समय में और जरूरी हो जाते हैं। ये हमें गलत रास्ते पर जाने से बचाते हैं।
योग यह नहीं कहता कि हम दुनिया से दूर हो जाएं। दुनिया को त्याग दें, बल्कि योग हमें यह सिखाता है कि हम हर स्थिति को शांति से समझें और बिना गुस्से या डर के काम करें। इस दौरान केवल अपनी सांसों पर ध्यान देना भी बहुत मददगार होता है। यह हमें वर्तमान में बनाए रखता है और चिंता को कम करता है।
भारत की परंपरा सिखाती है ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ यानी पूरी दुनिया एक परिवार है। अनिश्चितता जीवन का हिस्सा है, इसे खत्म नहीं किया जा सकता। लेकिन अगर हम अपने मन को मजबूत और शांत बना लें, तो हम हर स्थिति का सही तरीके से सामना कर सकते हैं। जब लोग धैर्य, समझ और करुणा अपनाते हैं, तो धीरे-धीरे दुनिया में भी शांति बढ़ने लगती है।

