आखिर घुसपैठियों के पास कहां से आते हैं भारतीय पासपोर्ट

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भारतीय पासपोर्ट का दुरुपयोग कर बांग्लादेशी घुसपैठिए विदेश जा रहे हैं। फर्जी दस्तावेजों से पासपोर्ट बनवाकर वे यूरोप जैसे देशों में पहुंच रहे हैं। यह भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि के लिए चिंता का विषय है। पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाकों में ऐसे गिरोह सक्रिय हैं। यह मामला देश की सुरक्षा के लिए गंभीर है।

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विदेश मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि साल 2024 तक भारत में 9.26 करोड़ पासपोर्ट जारी हुए थे। 2026 तक लगभग 10 करोड़ लोगों के पास पासपोर्ट होने का आकलन है, यानी भारत की लगभग 6-7% आबादी के पास ही पासपोर्ट हैं। अब इनमें बांग्लादेशी घुसपैठियों ने फर्जी कागजों के सहारे कितने पासपोर्ट हासिल किए हैं इसकी गहराई से जांच की जानी चाहिए।

भारत की छवि पर असर

पासपोर्ट एक ऐसा दस्तावेज है, जो विदेश में भारतीय होने की पहचान है। ऐसे में, अगर कोई घुसपैठिया फर्जी डॉक्युमेंट की मदद से भारत का पासपोर्ट हासिल कर लेता है, तो यह न सिर्फ एक गंभीर अपराध है, बल्कि इससे दूसरे देश में भारत की छवि भी प्रभावित होती है। मसलन, अगर कोई घुसपैठिया भारतीय पासपोर्ट पर 'ओवरस्टे' करता है या वहां किसी गंभीर अपराध को अंजाम देता है तो उसे भारतीय ही समझा जाएगा। इसके अलावा, दूसरे देशों में भारतीय नागरिकों को वीजा देने का कोटा तय है। यदि कोई बांग्लादेशी भारतीय पासपोर्ट पर यूरोप, अमेरिका घूम रहा है, तो वह उस देश में किसी भारतीय के वीजा कोटे में भी सेंध लगा रहा होता है।

कोलकाता से फर्जी डॉक्युमेंट के जरिए बांग्लादेशी घुसपैठिए भारतीय पासपोर्ट हासिल कर विदेश जाते हैं। 2018 से 2023 के बीच ऐसे 3,000 बांग्लादेशी घुसपैठिए भारतीय पासपोर्ट पर यूरोप पहुंच गए। बांग्लादेशियों को यूरोपीय देशों का वीजा आसानी से नहीं मिलता, इसलिए वे फर्जी रैकेट के जरिए जाली डॉक्युमेंट से भारतीय पासपोर्ट हासिल कर यूरोप की यात्रा करते हैं। बांग्लादेश से सटे पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में ऐसे गिरोह दशकों से सक्रिय रहे हैं। मालदा जिले में पासपोर्ट आवेदनों की संख्या असामान्य रूप से अधिक रही है। 2023 में सिर्फ मालदा में 14,000 पासपोर्ट बने थे। मतदाता पहचान पत्र, आधार, PAN कार्ड बनाने के तुरंत बाद उन्हें पासपोर्ट भी मिल गया।

कोलकाता के मटियाबुर्ज और गार्डन रीच में फर्जी प्रमाण पत्र आसानी से बन जाते हैं। इनके सहारे राशन कार्ड बनवाए गए, फिर इसके आधार पर मतदाता सूची में नाम से लेकर पासपोर्ट तक बनवा लिया गया। साल 1996 में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी ए.के. भट्टाचार्य ने स्वयं 16,000 संदिग्ध पासपोर्ट आवेदनों की जांच की। फिर उन्होंने आवेदकों के स्थायी और वर्तमान पते पर चिट्ठी भेजी, तो वहां कोई नहीं मिला। ऐसे में सवाल है कि क्या बगैर राजनीतिक संरक्षण के यह इकोसिस्टम चल सकता है?

आते हैं, लेकिन लौटते ही नहीं

पश्चिम बंगाल में तो 1984 से ही बांग्लादेशी घुसपैठियों के भारतीय पासपोर्ट बनवाने की खबरें आती रही हैं। मई, 1984 में एक राष्ट्रीय पत्रिका में छपी रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य की खुफिया शाखा को पता था कि फॉरवर्ड ब्लॉक के नेता कलीमुद्दीन शम्स ने अपने रसूख से बांग्लादेश से आए अवैध बिहारी मुस्लिम घुसपैठियों को पासपोर्ट दिलवाकर उन्हें भारत में बसाया था। 1977-1984 के बीच पासपोर्ट अधिकारियों ने कलीमुद्दीन के हस्ताक्षर वाले 300 आवेदन खारिज कर दिए, क्योंकि शक था कि वे विदेशी नागरिक हो सकते हैं। मोहम्मद हाकिम और जू मोहम्मद अफगान नागरिक निकले। कलीमुद्दीन ने उन्हें भारतीय बताया था।

बांग्लादेशी घुसपैठियों के पीछे एक संगठित और सुनियोजित रैकेट सक्रिय रहा है। उदाहरण के तौर पर, बांग्लादेश के लोग वीजा लेकर भारत तो आते हैं, मगर वापस नहीं जाते हैं। साल 1991 में 13,424 बांग्लादेशी भारत आए, लेकिन केवल 9,645 ही लौटे। 1992 में 21,574 में से सिर्फ 12,160 और 1994 में 29,757 में से 21,436 ही वापस गए। भारत आकर वापस नहीं जाना देश की सुरक्षा एजेंसियों के लिए चिंता का विषय बन जाता है। ऐसे भी कई मामले हैं, जिनमें बांग्लादेश के लोग मेडिकल वीजा लेकर भारत आए और बिना इलाज कराए गायब हो गए। कई लोग घूमने के बहाने भारत आते हैं और फिर वापस ही नहीं जाते हैं।

(ये अंश घुसपैठिए डिटेक्ट, डिलीट, डिपोर्ट, नाम की किताब के हैं, जिसे गरुड़ प्रकाशन ने प्रकाशित किया है )