लिवर की सख्ती जानलेवा, सुधार न हो तो ट्रांसप्लांट अंतिम विकल्प

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लिवर की कठोरता से उसकी सेहत का पता चलता है। केजीएमयू की रिसर्च बताती है कि एक्यूट ऑन क्रॉनिक लिवर फेल्योर के मरीजों में लिवर की कठोरता 70 से ऊपर रहने पर जान का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में लिवर ट्रांसप्लांट ही एकमात्र उपाय बचता है। यह रिसर्च एशिया-प्रशांत यकृत अध्ययन संघ में प्रस्तुत की जाएगी।

liver hardness is fatal hardness above 70 means transplant is the last hope

n NBT न्यूज, लखनऊ : लिवर की सेहत का अंदाजा उसकी ‘हार्डनेस’ (कठोरता) से लगाया जाता है। किंग KGMU के डॉ. सुधीर वर्मा की रिसर्च के मुताबिक, एक्यूट ऑन क्रॉनिक लिवर फेल्योर ( ACLF ) के मरीजों में अगर लिवर की हार्डनेस लगातार दो हफ्तों तक 70 से अधिक बनी रहती है, तो यह जानलेवा हो सकता है। ऐसे मामलों में लिवर ट्रांसप्लांट ही विकल्प बचता है। इस महत्वपूर्ण रिसर्च को तुर्किये के इस्तांबुल में होने वाले 'एशिया-प्रशांत यकृत अध्ययन संघ' (APASL) 2026 में प्रस्तुति के लिए चुना गया है।

90 दिन तक 56 मरीजों पर स्टडी : रिसर्च विशेष रूप से ACLF के 56 मरीजों पर की गई। इनकी स्थिति को लगातार 90 दिनों तक मॉनिटर किया गया। लिवर की कठोरता में हो रहे बदलाव को सटीक रूप से समझने के लिए हर हफ्ते फाइब्रोस्कैन किया गया। फाइब्रोस्कैन लिवर की सख्ती मापने की आधुनिक तकनीक है, जिसमें अधिकतम स्कोर 75 होता है।

मुख्य बिंदु : जिन मरीजों की लिवर हार्डनेस 70 से ऊपर बनी रही, उनकी स्थिति बेहद गंभीर हो गई। जिन मरीजों की लिवर कठोरता 2 हफ्तों के भीतर 70 से कम होती गई, वे पूरी तरह ठीक हो गए।