लोकतंत्र में साख हासिल करने का सबसे बड़ा और जांचा-परखा हथियार आंदोलन है। आंदोलन से उभरी राजनीति को सफलताएं मिल भी जाती हैं, लेकिन फिर उनमें बिखराव शुरू हो जाता है। आम आदमी पार्टी के साथ भी क्या ऐसा ही हो रहा है? राघव चड्ढा की अगुआई में आप के दस में से सात सांसदों के बगावती होने और BJP में शामिल होने के बाद कुछ ऐसे ही सवाल उठ रहे हैं।
AAP का आरोप । बगावती सांसदों पर आरोप है कि उन्होंने ईडी और केंद्रीय एजेंसियों के दबाव में पाला बदला। पार्टी का जन्म देशव्यापी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की कोख से हुआ था। ऐसे में अगर उसके सांसद भ्रष्टाचार के डर से पाला बदलते हैं तो सवाल यह उठता है कि क्या इन नेताओं ने भ्रष्टाचार किया है या वे झूठे मुकदमों के डर से पार्टी बदल रहे हैं। अगर वे गलत नहीं हैं तो उन्हें अदालत में उन आरोपों को चुनौती देनी चाहिए।
जनांदोलन के नेता । कांग्रेसी सरकारों में भ्रष्टाचार के खिलाफ 1970 के दशक में जेपी आंदोलन हुआ। इस आंदोलन का एक लक्ष्य व्यवस्था बदलना भी था। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने तब जयप्रकाश नारायण को पत्र लिखकर आशंका जताई थी कि आंदोलन में शामिल हो रहे नेता व्यवस्था में बदलाव के लिए नहीं, सत्ता के लिए आ रहे हैं। चंद्रशेखर की आशंका सच हुई। ज्यादातर नेता आज पारिवारिक पार्टियों के नेता हैं। कई पर भ्रष्टाचार को लेकर मुकदमे चल रहे। इन नेताओं का जातीय आधार पर टिकी राजनीति के चलते अस्तित्व बचा हुआ है, लेकिन असम से घुसपैठियों को बाहर निकालने वाले आंदोलन से उभरी पार्टी असम गणपरिषद के नेताओं के बारे में आज देश कितना जानता है?
दिग्गज गए छोड़ । यह पहला मौका नहीं है जब आम आदमी पार्टी को बड़े नाम छोड़कर निकलें हों। पार्टी के संस्थापकों में शामिल रहे योगेंद्र यादव और मशहूर वकील प्रशांत भूषण को शुरू में ही या तो निकाल दिया था या वे निकल गए थे। अन्ना आंदोलन में अरविंद केजरीवाल के साथ रहीं पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी ने अलग राह चुनी। शुरुआती दिनों से ही पार्टी का बड़ा चेहरा रहीं शाजिया इल्मी भी आज BJP में हैं। JNU के प्रोफेसर रहे आनंद कुमार और कैलाश गहलोत समेत कई अलग हो गए।
क्यों बिदक रहे करीबी । भारतीय राजनीति में ऐसी बगावत नई नहीं है। लेकिन सवाल है कि जिस पार्टी की डेढ़ दशक की उम्र भी नहीं, उसके महत्वपूर्ण नेता आखिर क्यों जा रहे हैं? राघव चड्ढा, संदीप पाठक तो पार्टी के शुरुआती दिनों से रणनीतिकार और संगठक रहे हैं। दोनों केजरीवाल के नजदीक भी माने जाते रहे। स्वाति मालीवाल का दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष के तौर पर कार्यक्षेत्र तो दिल्ली था पर BJP शासित राज्यों में हुए कथित महिला अत्याचारों की जांच के लिए भी वह पहुंचती थीं ताकि पार्टी को अपने दलीय एजेंडे के तहत कठघरे में खड़ा किया जाए। पर अब वे भी बगावती हैं।
नफे में BJP ही । इस बगावत का सीधा फायदा BJP को ही होगा। अगले साल गुजरात और पंजाब में चुनाव हैं। वहां आप बार-बार तीसरा कोण बनाने की कोशिश करती है। बगावत से उसके जमीनी कार्यकर्ताओं के मनोबल पर असर पड़ेगा। पंजाब में BJP कायदे से उपस्थिति भी दर्ज नहीं करवा पाई। वहीं,आप ने पिछला विधानसभा चुनाव भी राघव चड्ढा के ही प्रभार में जीता। BJP इनके जरिए पंजाब में आप के किले में सेंध लगाने की कोशिश करेगी।
आप का वार । वैसे आप इन नेताओं की संसद सदस्यता खत्म करवाने की कोशिश कर रही है। कपिल सिब्बल ने तो तर्क ही दे दिया है कि किसी पार्टी में शामिल होने के लिए टूटे हुए गुट को पहले दल बनाना होता है। मगर, राघव की अगुआई वाले नेताओं ने सीधे BJP में शामिल होने का ऐलान कर दिया है। आप राज्यसभा सभापति को चिट्ठी भी देने जा रही है। उधर बागी नेताओं की अगुआई में पंजाब में आप विधायकों में बड़ी टूट-फूट हो तो कोई हैरानी नहीं। छोटी बगावतों से इतर यह पहला मौका है जब संसदीय दल का बड़ा हिस्सा आप से अलग हो चुका है। ऐसे में पार्टी नेतृत्व को अपने गिरेबान में झांकना होगा।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

