तमिलनाडु के एक विद्वान परिवार में जन्मे के. श्रीनिवास कृष्णन में शुरुआत से ही विज्ञान और भाषाओं में असाधारण रुचि थी। उन्होंने मदुरै के अमेरिकन कॉलेज, मद्रास क्रिश्चियन कॉलेज और कलकत्ता यूनिवर्सिटी में शिक्षा प्राप्त की। उस दौर में भारत में वैज्ञानिक चेतना नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रही थी। उन्होंने कलकत्ता के इंडियन एसोसिएशन फॉर द कल्टिवेशन ऑफ साइंस में सी.वी. रमन के साथ प्रकाश के प्रकीर्णन (प्रकाश की किरणों का किसी सतह से टकराकर चारों ओर बिखर जाना) पर काम किया। इससे 1928 में ‘ रमन प्रभाव ’ की खोज संभव हुई। बाद में ढाका विश्वविद्यालय में उन्होंने क्रिस्टल (ठोस पदार्थ) के चुंबकीय गुणों को समझने के लिए नए तरीके विकसित किए। उनका यह काम आगे चलकर भौतिकी की नींव साबित हुआ। उनके जीवन की एक घटना उनकी ईमानदारी को रेखांकित करती है। जब प्रयोग अपेक्षित परिणाम नहीं दे रहे थे, तो उन्होंने आंकड़ों को सुधारने से इनकार कर दिया और ईमानदारी से खोज में लगे रहे। और इसमें उन्हें सफलता मिली। वह भारतीय राष्ट्रीय भौतिक प्रयोगशाला के संस्थापक निदेशक बने, जहां उन्होंने मेट्रोलॉजी और पदार्थ विज्ञान को नई दिशा दी। कृष्णन का जीवन सिखाता है कि सफलता सत्य के प्रति निष्ठा, ईमानदारी और राष्ट्र के प्रति समर्पण से मिलती है।

