शिवाजी का हिंदी प्रेम

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छत्रपति शिवाजी केवल योद्धा नहीं, जनभाषा को समझने वाले शासक थे। उनका हिंदी प्रेम असाधारण था। उन्होंने युद्ध के बजाय संवाद को चुना। आगरा में औरंगजेब की कैद के दौरान भी वे आम लोगों से हिंदी में ही बात करते रहे। मथुरा, प्रयागराज और काशी की यात्राओं में वे साधु-संतों से हिंदी में मिले।

shivajis love for hindi the power of connecting hearts through vernacular language

छत्रपति शिवाजी एक महान योद्धा ही नहीं, जनभाषा और जनभावना को समझने वाले दूरदर्शी शासक भी थे। उनका हिंदी के प्रति प्रेम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने यह समझ लिया था कि किसी भी राष्ट्र की असली ताकत उसकी जनता और उसकी भाषा में होती है। जब राजा जयसिंह प्रथम उनके विरुद्ध विशाल सेना लेकर आए, तब शिवाजी ने युद्ध के बजाय संवाद का मार्ग चुना। भले ही औपचारिक पत्राचार फारसी में हुआ, पर उनकी बातचीत की भाषा हिंदी थी। यह उनकी व्यवहारिकता और जनसंपर्क की शक्ति को दर्शाता है। आगरा में औरंगजेब की कैद के दौरान शिवाजी आम लोगों से हिंदी में ही संवाद करते रहे। मथुरा, प्रयागराज और काशी की यात्रा के दौरान वह साधु-संतों और आम जन से इसी भाषा में घुल-मिल गए। राज्याभिषेक के समय काशी के विद्वान गागा भट्ट से भी उन्होंने हिंदी में संवाद किया। आगे चलकर उन्होंने अपने शासन में फारसी के स्थान पर हिंदी और मराठी को बढ़ावा दिया। शिवाजी का जीवन हमें सिखाता है कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, लोगों के दिलों को जोड़ने की शक्ति है। उनका हिंदी प्रेम आज भी प्रेरणा देता है कि अपनी भाषा पर गर्व करें और उसे अपनाएं।