आम एल-नीनो से ज्यादा खतरनाक सुपर एल-नीनो दुनिया भर के कई हिस्सों में मौसम का संतुलन बिगाड़ने का माद्दा रखता है। दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में कहीं भयानक सूखा पड़ सकता है और कहीं जानलेवा बाढ़ देखने को मिल सकती है। भारत की अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा दक्षिण पश्चिमी मॉनसून पर निर्भर करता है, जो प्रभावित हो सकता है।
क्या है सुपर एल-नीनो । एल-नीनो समुद्री मौसम से जुड़ी घटना है जो तब होती है जब प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से 0.5 डिग्री अधिक गर्म हो जाए। तापमान सामान्य से दो डिग्री या इससे अधिक गर्म हो तो यह सुपर एल-नीनो है। यही जब सामान्य से ठंडा हो जाए तो ला-नीना कहा जाता है। समुद्र के पानी का तापमान सामान्य होने पर इसे न्यूट्रल स्थिति कहा जाता है। IMD के मुताबिक जुलाई में एल-नीनो के सक्रिय होने की काफी अधिक आशंका है, जिससे सितंबर तक सामान्य से करीब 92% कम बारिश हो सकती है।
क्या हैं हालात । 2015 में इसने दुनिया के कई हिस्सों में तबाही मचाई। इथियोपिया में भयंकर सूखा पड़ा, प्यूर्टो रिको में जल संकट पैदा हुआ। भारत में भी सूखा पड़ा। सबसे विनाशकारी कहे जाने वाले 1877-78 के एल-नीनो में लाखों मौतें हुईं। अनुमान है कि इस बार यह और ताकतवर होगा। 2027 में वैश्विक तापमान के नए रेकॉर्ड तोड़ सकता है। अभी प्रशांत महासागर में जो 8046 किमी लंबी 'गर्मी की लहर' फैली हुई है, वह माइक्रोनेशिया से शुरू होकर कैलिफोर्निया तक पहुंच चुकी है। यही लहर एल-नीनो को मजबूत कर रही है।
भारत पर असर । कम बारिश, ज्यादा गर्मी और जल संकट पैदा होगा। GDP में खेती का हिस्सा करीब 18% है। 58% से ज्यादा ग्रामीण परिवार आय के लिए मॉनसून पर निर्भर हैं। करीब 64% भारतीय खेती से जुड़े हैं। मॉनसून अच्छा होता है तो ग्रामीण इलाकों की कमाई बढ़ती है। ट्रैक्टर, बाइक, रोजमर्रा के सामान की डिमांड बढ़ती है। वहीं, बारिश कम होने पर महंगाई बढ़ती है और ग्रामीण डिमांड घटती है। 50% से अधिक खेती मॉनसून पर टिकी है। बारिश की कमी से खरीफ की पैदावार कम होगी और महंगाई बढ़ेगी।
तैयारियां जरूरी । सरकार और आम जन दोनों को तैयारी करनी होगी। पानी की बचत, सूखा प्रबंधन, फसल बीमा पर जोर देना होगा। किसानों को सूखा सहन करने वाली फसलें लगाने की सलाह दी जानी चाहिए। शहरों में कूलिंग सेंटर्स बनाए जाएं।


