आप भले ही आम को फलों का राजा कहते हों, लेकिन मेरा मन तो यह उपाधि तरबूज को देने को करता है। कितना कमाल का फल है तरबूज। पहले उसकी खूबसूरती देखिए। सुडौल। गोल। अंडाकार। बाहर से एकदम हरा और भीतर चटख लाल। दो रंगों का अद्भुत मेल। देखते ही आंखों में चमक आ जाए। मुंह में आ जाए पानी। और इसका स्वाद देखिए- अहा। आत्मा तक तृप्त हो जाए। आपका पेट भी भर दे और प्यास भी बुझा जाए। टू इन वन। विशिष्टता देखिए- शर्बत बनाएं, तो न पानी की जरूरत और न चीनी की। थोड़े से श्रम से एकदम प्योर पेय तैयार। कुदरती खनिज-लवणों और विटामिनों से लबरेज। है किसी अन्य फल में इतनी सारी विशिष्टताएं? इतने सारे गुण? और फिर इसकी उदारता देखिए। अमीर हो या गरीब, इस भीषण गर्मी में बिना किसी भेदभाव के हर किसी का गला तर करने की क्षमता रखता है। सर्व सुलभ। सस्ता। बड़ा सा एक तरबूज पूरे घर के लिए पर्याप्त है।
मैं तो कहता हूं कि आम से इसकी तुलना करना ही बेमानी है। कहां तरबूज और कहां आम! आम में बहुत भेदभाव है। देखिए तो, कितने तरह के आम हैं। हापुस, केसर, दशहरी, लंगड़ा, सिंदूरी, नीलम, चौसा, तोतापुरी, पायरी, राजपुरी, सफेदा, बादामी, सिंधु, आम्रपाली, मल्लिका, सुवर्णरेखा, फैजली, वनराज जैसी पचासों किस्म की प्रजातियां हैं। हर आम हर कोई नहीं खा सकता है। गरीब लोग हापुस को सिर्फ देखते हैं, छूते तक नहीं। केसर और दशहरी को छू लेते हैं, लेकिन ले नहीं पाते। वे लंगड़े तक का पीछा मुश्किल से कर पाते हैं। उनके लिए तो नीलम, सिंदूरी, तोतापुरी, सफेदा, चौसा, बादामी, पायरी जैसे आम बने हैं, जिन्हें पूरा घर छक कर खा सकता है। जूस या शर्बत बना सकता है।
अब आप ही बताइए कि फलों का राजा किसको कहना चाहिए? मेरी समझ से असल राजा तो वही है, जो जन-साधारण तक पहुंचे। जिसके बर्ताव में भेदभाव न हो। जो सबको एक ही तरह से देखे। जिस तक हर किसी की फरियाद पहुंच जाए। ये सारे गुण तरबूज में हैं, आम में नहीं।


