हेमंत राजौरा
आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों का BJP में जाना कांग्रेस के लिए बड़ा राजनीतिक अवसर है। पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनावों की जमीन तैयार हो रही है। प्रदेश कांग्रेस सत्ता वापसी के लिए संगठन को नए सिरे से मजबूत करने में जुटी है। ऐसे में अहम सवाल है कि इस घटनाक्रम से कांग्रेस को क्या राजनीतिक लाभ मिल सकता है और उसकी रणनीति क्या है?
संगठन की मजबूती पर जोर
पंजाब कांग्रेस ने हाल ही में जिला और ब्लॉक स्तर पर लगभग तीन लाख कार्यकर्ताओं की नियुक्ति कर अपने संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। 29 जिला कांग्रेस अध्यक्षों की नियुक्ति पहले ही हो चुकी है। कांग्रेस इस घटनाक्रम को AAP की आंतरिक कमजोरी, नेतृत्व संकट और राजनीतिक अस्थिरता के रूप में पेश कर रही है। उसका तर्क है कि जिस पार्टी ने खुद को वैकल्पिक राजनीति का चेहरा बताया, उसके वरिष्ठ सांसदों का एक साथ दूसरी पार्टी में जाना, वैचारिक और संगठनात्मक संकट को उजागर करता है।
कांग्रेस इस विमर्श को जनता के बीच ले जाकर संदेश देना चाहती है कि AAP की सरकार स्थिर दिख रही है लेकिन उसके भीतर गहरी दरारें हैं। हालांकि विधानसभा में AAP के पास 117 में से 92 सीटों का मजबूत बहुमत है, लेकिन राजनीति केवल संख्या का खेल नहीं। सांसदों के जाने से राष्ट्रीय स्तर पर AAP की छवि को झटका लगा है। पंजाब में कांग्रेस इसे नेतृत्व पर अविश्वास के रूप में प्रचारित कर सकती है। खासकर तब, जब पार्टी लोकसभा चुनाव (2024) में पंजाब की 13 में से 7 सीटें जीतकर पहले ही वापसी के संकेत दे चुकी है। AAP को तब केवल 3 सीटें मिली थीं।
राज्य में कांग्रेस की रणनीति तीन स्तरों पर दिखती है। पहला, संगठन को बूथ स्तर तक पुनर्गठित करना। दूसरा, AAP की राजनीतिक विश्वसनीयता पर लगातार हमला। तीसरा, खुद को पंजाब की पारंपरिक और स्थिर राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करना। कांग्रेस स्थानीय मुद्दों जैसे किसान, बेरोजगारी, नशा, उद्योग और कानून-व्यवस्था को लेकर भी आक्रामक रुख अपना रही है। AAP सरकार पर प्रशासनिक अक्षमता का आरोप लगाकर कांग्रेस जनता के बीच यह धारणा बनाना चाहती है कि राज्य को फिर से कांग्रेस के अनुभवी नेतृत्व की जरूरत है। कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी उसका आंतरिक गुटबाजी का इतिहास है। चरणजीत सिंह चन्नी, अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग जैसे नेताओं के बीच मतभेद कई बार खुलकर सामने आए। केंद्रीय नेतृत्व ने सार्वजनिक बयानबाजी पर लगाम लगाने के लिए कहा भी है। उसने दोनों नेताओं को साथ बुलाकर संकेत दिया कि 2027 की लड़ाई व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से नहीं, सामूहिक रणनीति से जीती जाएगी। यदि पार्टी अंदरूनी मतभेदों को खत्म कर पाती है तो AAP संकट का उसे सबसे ज्यादा फायदा मिल सकता है।
सत्ता में वापसी की दावेदारी
दरअसल, BJP का पंजाब में ज्यादा प्रभाव नहीं है और शिरोमणि अकाली दल फिलहाल अपनी खोई जमीन तलाश रहा है। ऐसे में मुख्य मुकाबला कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच ही होगा। आगामी चुनाव यह भी तय करेगा कि लंबे समय तक पंजाब की राजनीति में अगला केंद्रीय ध्रुव कौन होगा। अगर कांग्रेस संगठनात्मक मजबूती, एकजुट नेतृत्व और स्पष्ट मुद्दा-आधारित अभियान लेकर बढ़ी, तो पंजाब की सत्ता में वापसी की गंभीर दावेदार बन सकती है।


