पश्चिम बंगाल में TMC के 15 वर्ष के शासन के खिलाफ नाराजगी खुलकर सामने आ रही है। दूसरी ओर, BJP का राज्य में संगठन और मजबूत हुआ है। उसके हिंदू एकजुटता के अजेंडा को पहसे से ज्यादा समर्थन मिल रहा है। इन सबके बावजूद BJP के लिए चुनाव के दूसरे चरण की लड़ाई, खासकर कोलकाता और आसपास के शहरी इलाकों में कठिन मानी जा रही है। दूसरे चरण की वोटिंग आज है।
मध्यमवर्गीय हिंदू । BJP बंगाल के शिक्षित हिंदू मध्यम वर्ग के कुछ हिस्सों में अपनी स्वीकार्यता चाहती है। यह बंगाल का भद्रलोक है। यूं तो भद्रलोक कभी कोई चुनावी वर्ग या सामाजिक श्रेणी नहीं रहा। ऐतिहासिक रूप से इस शब्द का इस्तेमाल बंगाल में पढ़े-लिखे उच्च जाति के मध्यम वर्गीय हिंदुओं के लिए होता है। इनमें से ज्यादातर के पास प्रॉपर्टी थी और ब्रिटिश काल में कोलकाता और उसके आसपास सामाजिक जीवन में इनका प्रभाव रहा।
सभ्यता का संरक्षक । जिस पुरानी दुनिया ने भद्रलोक को जन्म दिया, वह अब बदल चुकी है, पर असर अब भी है, विशेष रूप से कोलकाता और राज्य के पुराने शहरी इलाकों में। आज भी भद्रलोक खुद को बंगाली सभ्यता का संरक्षक मानता है। इसने कभी एकजुट होकर किसी पार्टी को वोट नहीं किया, पर अगर यह किसी पार्टी को अपनाता है तो उसे बंगाल के शहरी मध्यम वर्ग में सांस्कृतिक स्वीकृति मिल जाती है।
रासबिहारी में वादा । BJP के लिए भद्रलोक के समर्थन की अहमियत साफ है। इससे जो वोट हिंदुत्व के नाम पर पड़ा है, वह सही और समझदारी वाला फैसला लगेगा। दक्षिण कोलकाता के रासबिहारी इलाके में BJP की चुनौती दिखती है। यहां से पार्टी के उम्मीदवार हैं स्वपन दासगुप्ता। उनके अपने चुनावी घोषणापत्र में कालीघाट और आदि गंगा को फिर से बेहतर बनाने का वादा है। उन्होंने रवींद्र सरोवर को सुरक्षित करने और सुंदरीकरण की बात कही है। यहां BJP दिखाना चाहती है कि वह क्षेत्र को बेहतर और सांस्कृतिक रूप से मजबूत बनाने की बात भी करती है।
आम मुद्दे । रासबिहारी इलाका लंबे समय से TMC का गढ़ रहा है। BJP अब यहां दासगुप्ता जैसे चेहरों के साथ मैदान में है। उनका चुनाव प्रचार BJP की राजनीति को दक्षिण कोलकाता की आम चिंताओं से जोड़ता है, मसलन रवींद्र सरोवर के आसपास कैफे, पब्लिक स्पेस। उद्देश्य है कि BJP बाहरी के बजाय भद्र लगे।
ममता से असहजता । ममता बनर्जी की ताकत और उनकी करिश्माई सार्वजनिक शैली कभी पुराने कोलकाता के भद्रलोक पर निर्भर नहीं रही। उन्होंने इस समाज के बाहर के लोगों के साथ जुड़कर लेफ्ट के वर्चस्व को चुनौती दी। उनका अंदाज भद्रलोक के एक हिस्से को हमेशा असहज करता रहा। लेकिन, अब हालात बदल गए हैं। भर्ती घोटालों के आरोप, सिंडिकेट राज और महिला सुरक्षा जैसे मुद्दों ने मौका दिया है कि उस असहजता को खुलकर सरकार के खिलाफ शिकायत बने।
दो चेहरे । SIR विवाद ने इस चुनाव की तपिश बढ़ाई है और दूसरे चरण में भी इसका असर रहेगा। इसके बीच यह सवाल भी है कि क्या BJP उन लोगों के बीच जगह बना पाएगी, जो खुले तौर पर आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति को पसंद नहीं करते, लेकिन जब उसी राजनीति को अच्छे शासन के नाम पर पेश किया जाता है तो स्वीकार कर लेते हैं? भवानीपुर में सुवेंदु अधिकारी ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया है और सीधे ममता से मोर्चा लिया है। उसी शहर में, रासबिहारी में दासगुप्ता BJP की एक दूसरी छवि पेश कर रहे हैं। वह अपनी पार्टी को उस जगह स्थापित करने के प्रयास में हैं, जहां उसे कभी बहुत शोर मचाने वाली, हिंदी पट्टी की और सांस्कृतिक रूप से बहुत दूर की कहकर खारिज कर दिया जाता था।
हिंदुत्व का इतिहास । बंगाल में हिंदुत्व का इतिहास BJP से नहीं शुरू होता। इतिहासकार जोया चटर्जी ने बताया है कि अंग्रेजी राज में उच्च जाति भद्रलोक का कुछ हिस्सा सांप्रदायिक हिंदू राजनीति की ओर मुड़ गया था। क्योंकि प्रतिनिधित्व की राजनीति में मुस्लिमों और निचली जातियों का प्रतिनिधित्व बढ़ रहा था। BJP उस इतिहास को आज व्यवस्था और सांस्कृतिक गर्व के वादे में बदलना चाहती है। अगर शहरी भद्रलोक का एक हिस्सा यह मान लेता है कि ममता को हटाने के लिए BJP को वोट देना ठीक है, तो पार्टी को उस वर्ग से सांस्कृतिक स्वीकृति मिल जाएगी, जिसने उससे दूरी बनाकर रखी थी।
(लेखक अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में PhD कैंडिडेट हैं)


