एवरेस्ट पर कचरे से कलाकृति

Contributed byपूनम गौड़|नवभारतटाइम्स.कॉम
artworks made from garbage on everest a unique message to save the mountain
एवरेस्ट बेस कैंप की यात्रा में सबसे ज्यादा याद क्या रहता है? बर्फ से ढकी चोटियां, खामोश ग्लेशियर, सांस रोक देने वाली ऊंचाई, -32 डिग्री की ठंड या वह पल, जब सामने एवरेस्ट खड़ा दिखाई देता है? बीते दिनों एवरेस्ट बेस कैंप की ट्रैकिंग से लौटते हुए इन सबके अलावा एक और तस्वीर मेरे साथ लौटी- पहाड़ पर पड़े कचरे की। खाली ऑक्सीजन सिलिंडर, पुराने टेंट, रस्सियां, धातु के टुकड़े और प्लास्टिक दिखाई। एवरेस्ट क्षेत्र में फैला कचरा पर्यटन की पर्यावरणीय कीमत याद दिलाता है।

एक सच और है। 3,775 मीटर की ऊंचाई पर स्थित सागरमाथा नेक्स्ट इस समस्या को अवसर में बदल रहा है। यह ट्रेकर्स को रास्ते से कचरा इकट्ठा कर वापस लाने के लिए प्रेरित करता है। उन्हें पांच किलो का एक बैग दिया जाता है जिसमें वे रास्ते से कचरा इकट्ठा कर ला सकते हैं। बाद में, इसी कचरे को कला और डिजाइन के जरिए नई जिंदगी दी जाती है। इससे बनी आर्ट गैलरी में रखी चीजें सिर्फ कलाकृतियां नहीं हैं। फेंकी गई धातु, पुराने उपकरणों का हिस्सा, टेंट का कपड़ा, क्लाइंबिंग रोप और तिरपाल जैसी चीजों से कलाकार ऐसी आकृतियां बनाते हैं जिन्हें देखकर यकीन करना मुश्किल होता है कि ये कभी पहाड़ पर पड़ा कचरा भी हो सकती थीं। इसी के साथ यहां देखा एक दिलचस्प इंस्टॉलेशन। यह फेंके गए 1000 बीयर कैन से 'प्रेयर फ्लैग' जैसी संरचना थी। यहां आकर समझ आया कि कचरे की कीमत हमेशा उसके कबाड़ भाव से तय नहीं होती। सागरमाथा नेक्स्ट में ऐसी कलाकृतियां प्रदर्शित करने के साथ-साथ लोगों को बेची भी जाती हैं। जब हम वहां पहुंचे तो करीब 3 लाख से 15 लाख रुपये तक कीमत वाली कलाकृतियां मौजूद थीं। सच तो यह है कि इनकी कीमत में सिर्फ धातु, कपड़े या प्लास्टिक शामिल नहीं होता बल्कि एवरेस्ट पर सफर की कहानी, कचरा नीचे लाने की मेहनत, कलाकार का हुनर और पहाड़ को बचाने का संदेश शामिल होता है।
एक सवाल भी है। पहाड़ पर कूड़ा छोड़कर आने की आदत कब बदलेगी? पहाड़ पर जाते हैं, तस्वीरें लेते हैं और लौट आते हैं। जो चीज हम अपने साथ नहीं लाते, वह अक्सर पहाड़ पर रह जाती है यानी कचरा। एवरेस्ट से लौटते हुए मेरे साथ बर्फीली चोटियों की बहुत तस्वीरें थीं। लेकिन, सागरमाथा नेक्स्ट ने उनमें एक और तस्वीर जोड़ दी-कचरे से बनी कला की। अब एवरेस्ट याद आता है तो सिर्फ सफेद चोटियां नहीं दिखतीं। उनके बीच पड़ा कचरा भी दिखाई देता है और यह सवाल भी कि हम पहाड़ों से सिर्फ यादें लेकर लौटेंगे या अपनी जिम्मेदारी भी साथ ले जाएंगे?