Education System Reform Emphasis On Learning Instead Of Rote Questions On Examination System
रटने नहीं, सीखने पर देना होगा जोर
नवभारतटाइम्स.कॉम•
हाल के दिनों में देश की शिक्षा व्यवस्था की खराब हालत को लेकर कई सवाल उठे हैं। पेपर लीक , परीक्षा में धांधली की शिकायतें आम हो गई हैं। इन मुद्दों पर शिक्षाविद प्रफेसर अनीता रामपाल से नाइश हसन ने बातचीत की। पेश हैं मुख्य अंशः
n क्या राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ग्रामीण परिवारों और वंचितों की भी जरूरतें पूरी कर रही हैं या यह महज शहरों पर केंद्रित है?नई शिक्षा नीति के तहत स्कूल मर्ज करने के नाम पर हजारों छोटे सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं। इससे शिक्षा का अधिकार (RTE) प्रभावित हो रहा है, क्योंकि अब विद्यालय बच्चों से दूर जा रहे हैं। इसका फायदा निजी स्कूलों को मिल रहा है।
n हाल के दिनों में स्कूली किताबों से कुछ खास अध्यायों को हटाने या जोड़ने को लेकर भी विवाद रहा है। आप इसे कैसे देखती हैं?
पाठ्यपुस्तकों से लोकतंत्र, विविधता और डार्विन के विकासवाद जैसे वैज्ञानिक अध्यायों को हटाना चिंताजनक है। इतिहास के किसी कालखंड को 'अंधकार युग' बताना या ऐतिहासिक स्मारकों के चित्रों के साथ चुनिंदा विवादित संदर्भ जोड़ना बच्चों में सही समझ विकसित करने के बजाय वैचारिक भ्रम और नफरत पैदा करता है। यह बदलाव तार्किक और वैज्ञानिक सोच को बाधित कर अज्ञानता को बढ़ावा देता है।
n आपने शुरू से राष्ट्रीय परीक्षा के विचार की आलोचना की है। क्या NEET और CUET जैसी परीक्षाएं ही बार-बार होने वाली कुव्यवस्था की बड़ी वजह हैं?
NEET और CUET जैसी परीक्षाओं का सेंट्रलाइजेशन ही इसकी मुख्य जड़ हैं। नैशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) जैसी गैर-संवैधानिक संस्था की कोई जवाबदेही नहीं है, जिससे लगातार पेपर लीक और भ्रष्टाचार के मामले सामने आ रहे हैं। यह देश के संघीय ढांचे को चोट पहुंचाता है और राज्यों की भूमिका को भी खत्म कर देता है। n क्या प्राथमिक शिक्षा को मजबूत किए बगैर सिर्फ प्रवेश परीक्षाओं में बदलाव कर बेहतर शिक्षा व्यवस्था बनाई जा सकती है?
बुनियादी स्तर पर रटने के बजाय प्रयोगात्मक, विश्लेषणात्मक और निरंतर मूल्यांकन जरूरी है। 'शिक्षा का अधिकार' के तहत 14 साल की उम्र तक बोर्ड परीक्षाएं न कराने का नियम वैज्ञानिक था, लेकिन इसे बदलकर बुनियादी शिक्षा की आत्मा को खत्म कर दिया गया। केवल बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQ) छात्र की वास्तविक क्षमता, जिज्ञासा और तार्किक समझ का आकलन नहीं कर सकते।
n स्कूल दूर होने का सीधा असर लड़कियों की शिक्षा पर पड़ा है। क्या इससे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान कमजोर नहीं पड़ेगा?
हां, इसकी शिकार लड़कियां ही ज्यादा हैं। मां-बाप अब बेटियों को दूर स्कूल भेजना नहीं चाहेंगे, जिससे ड्रॉप-आउट रेट तेजी से बढ़ रहा है। इससे 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' का राष्ट्रीय संकल्प भी कमजोर पड़ रहा है।
n कोचिंग कल्चर और प्राइवेटाइजेशन का सीधा असर सरकारी स्कूलों की शिक्षा पर पड़ रहा है। शिक्षा के बढ़ते बाजारीकरण के बीच हम समावेशी व्यवस्था कैसे ला सकते हैं?
कोचिंग कल्चर हमारी औपचारिक स्कूली शिक्षा की विफलता का प्रतीक है। शिक्षा के बाजारीकरण ने असमानता की खाई और गहरी कर दी है। जवाबदेही तय करने के वास्ते हमें 'वन नेशन, वन एग्जाम' जैसे केंद्रीकृत मॉडलों को छोड़ना होगा, जो कोचिंग माफिया को पोषित करते हैं।
n क्या परीक्षा केंद्र दूर रखना अभ्यर्थियों पर प्रशासनिक नाकामी का बोझ डालने जैसा नहीं है?
हां, यह वही है। असल समस्या चुनिंदा शहरों के कोचिंग संस्थान और संदिग्ध सेंटरों के साथ सांठगांठ है, जहां सफलता दर सामान्य से छह गुना अधिक है। प्रशासन को केंद्र दूर करने के बजाय इन भ्रष्ट केंद्रों और पेपर लीक करने वालों पर कठोर कार्रवाई करनी चाहिए।
n सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता और जवाबदेही के वास्ते राज्य और केंद्र सरकार को क्या करना चाहिए?
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल ब्लैकबोर्ड देखने या रटने से नहीं आएगी। इसके लिए बच्चों के साथ जुड़ाव, क्लासरूम और लाइब्रेरी में प्रयोगात्मक गतिविधियां करनी पड़ेगी। यह कमी सरकारी और छोटे निजी स्कूल दोनों में है।
n क्या बार-बार पेपर लीक सिर्फ सुरक्षा की चूक है या पूरी व्यवस्था की नाकामी है?
यह संकट महज सुरक्षा में चूक का नहीं है। यह व्यवस्थागत दोष है। बार-बार पेपर लीक दर्शाता है कि NTA जैसी संस्था परीक्षा माफिया के आगे घुटने टेक चुकी है।
n तमिलनाडु शुरू से NEET का विरोध कर रहा है। क्या राष्ट्रीय परीक्षाएं राज्यों की शिक्षा संबंधी स्वायत्तता को कमजोर कर रही हैं?
तमिलनाडु का विरोध पूरी तरह जायज है। NEET ने ग्रामीण, गरीब और वंचित छात्रों को मेडिकल की पढ़ाई से बाहर कर दिया है। शिक्षा समवर्ती सूची में है, इसलिए राज्यों को प्रवेश नीतियां बनाने की स्वायत्तता मिलनी चाहिए।