ड्रैगन से फिर डरी दुनिया

नवभारतटाइम्स.कॉम
world fears again due to chinas rising exports employment crisis for india
चीन से पूरी दुनिया डरी है। यह डर ट्रेड डेफिसिट का है। यानी जितना माल चीन दूसरे मुल्कों को बेच रहा है, उसके मुकाबले बहुत कम सामान उनसे खरीद रहा है। इससे भारत सहित दूसरे देशों में बड़े पैमाने पर रोजगार खत्म होने का अंदेशा है। ऐसा पहले भी हो चुका है। इसलिए पश्चिमी देश ट्रेड बैरियर्स की चेतावनी दे रहे हैं।

भारत की स्थिति । गलवान में झड़प के बाद भारत और चीन के रिश्तों में तल्खी आई, लेकिन व्यापार बढ़ता रहा। पिछले वित्त वर्ष में भारत का व्यापार घाटा 112 अरब डॉलर के रेकॉर्ड लेवल पर पहुंच गया। दोनों देशों के बीच तल्खबयानी के बीच भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी चीन बना रहा। कुछ समय से भारत और चीन रिश्तों को सामान्य करने की कोशिश में जुटे हैं। लिपुलेख से दोनों के बीच व्यापार 6 बरसों के अंतराल के बाद फिर शुरू हो चुका है।
बढ़ जाएगा मर्ज । फिर भारतीय दवा कंपनियां चीन से बड़े पैमाने पर एक्टिव फार्मास्युटिकल्स इंग्रेडिएंट्स (API) भी खरीदती हैं। API को लेकर चीन पर निर्भरता खत्म करने को लेकर भारत में काफी बहस-मुबाहिसा भी हो चुका है। मगर स्थिति अभी तक सुधरी नहीं। यह इसलिए भी फिक्र की बात है क्योंकि भारत से दुनिया भर में जेनेरिक दवाओं का निर्यात होता है। इसलिए दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ने पर अगर API की सप्लाई रुकी तो इसकी कीमत पूरी दुनिया को चुकानी पड़ेगी।

चीनी रणनीति । ऊपर चीन के जिस डर का हमने जिक्र किया, उसकी वजह यह है कि पिछले साल उसने कोई 4 लाख करोड़ डॉलर का निर्यात किया है। यह कितनी बड़ी रकम है, उसे यूं समझिए कि पिछले वित्त वर्ष में भारत की जीडीपी 4.15 लाख करोड़ डॉलर रही। चीन के रेकॉर्ड एक्सपोर्ट ने भारत सहित दुनिया के सामने एक बड़ा संकट पैदा किया है। वह है चाइना शॉक 2.O.। इसे समझने से पहले बात करते हैं चाइना शॉक 1.O की।

रोजगार संकट बढ़ेगा । साल 2001 में चीन विश्व व्यापार संगठन में शामिल हुआ था, जिसके बाद उसने अमेरिका और यूरोप को अपने सस्ते माल से पाट दिया। चीन के पास बेशुमार सस्ता श्रम था। इसलिए चीनी माल सस्ता था, जिससे दूसरे देशों के मैन्युफैक्चर्स मुकाबला नहीं कर पाए। इससे विकसित देशों में बड़े पैमाने पर मैन्युफैक्चरिंग यूनिटें बंद हुईं और लाखों-करोड़ों रोजगार खत्म हुए। सिर्फ अमेरिका में ही 2001 से 2007 के बीच चीन से आयात तीन गुना बढ़ा, जिससे कुल मिलाकर 20 लाख रोजगार खत्म हुए।

डर बढ़ा । पहले चाइना शॉक की वजह जहां सस्ते कपड़े, खिलौने और फर्नीचर जैसी बेसिक चीजें थीं तो इस बार इलेक्ट्रिक गाड़ियां, सोलर पैनल, लिथियम ऑयन बैटरी की डंपिंग का डर दुनिया को सता रहा है। फिर इसमें जियो पॉलिटिक्स का भी पेच है। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग कह चुके हैं कि वह ताइवान को अपने देश में मिलाकर रहेंगे।

दरवाजे पर संकट । ऐसा हुआ तो पश्चिमी देशों के साथ चीन का तनाव चरम पर पहुंच जाएगा। चीन दुनिया की फैक्टरी है। कई देशों में जरूरी चीजों की सप्लाई वही करता है। लेकिन कोविड-19 के वक्त चीन से यह सप्लाई रोक दी थी। इसी के बाद ‘चाइना प्लस वन’ पॉलिसी की चर्चा शुरू हुई और अमेरिकी-यूरोपीय कंपनियों ने अपनी कुछ मैन्युफैक्चरिंग चीन से दूसरे देशों में शिफ्ट की।

टेक्नॉलजी में आगे । विकसित देशों में बेरोजगारी कम है, फिर भी वे चीन के बढ़ते निर्यात से डरे हैं। विकसित देशों के संगठन OECD ने बताया था कि 2024 में अमीर देशों के मुकाबले चीन ने 3-8 गुना ज्यादा सब्सिडी अपनी कंपनियों को दी। 2005 से 2023 के बीच वैश्विक बाजार में उसकी हिस्सेदारी 60% बढ़ी। IMF प्रमुख क्रिस्टलीना जियॉर्जिएवा को चीन से एक्सपोर्ट में कमी लाने की अपील करनी पड़ी। उन्होंने कहा कि चीन घरेलू मांग बढ़ाकर कमी लाए। अगर यह नहीं रुका तो दुनिया के देश चीनी सामानों पर टैरिफ बढ़ाने को मजबूर होंगे।

देश की जरूरत । भारत में भी चुनाव जीतने के लिए पिछले वर्षों में मुफ्त सौगात बांटने का चलन बढ़ा है। मौजूदा वित्त वर्ष में केंद्र सरकार ने खाद्य, उर्वरक और ईंधन पर सब्सिडी के लिए 4.10 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जो पश्चिम एशिया संकट की वजह से इससे अधिक ही रह सकता है। हालांकि, जरूरत आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, रोबॉटिक्स, रिन्यूएबल एनर्जी, स्किलिंग और ग्रीन टेक्नॉलजी में इनोवेशन पर खर्च और बढ़ाने की है। इनमें से कुछ क्षेत्रों को सरकार इंसेंटिव के जरिये बढ़ावा देने की कोशिश कर रही है, लेकिन वे कोशिशें नाकाफी हैं।