रटकर नहीं हो सकता AI से मुक़ाबला

नवभारतटाइम्स.कॉम
end of rote learning in the ai era a new flight of creativity in education
जेनरेटिव AI ने पिछले चार वर्षों में जितना बड़ा बदलाव दुनिया में ला दिया है, वैसी कोई मिसाल समूचे विश्व इतिहास में कहीं और कभी नहीं खोजी जा सकती। यह बदलाव इतने आराम से हुआ है कि ज्यादातर लोगों का अभी तक इस पर ध्यान भी नहीं जा सका है। जिस कोडिंग को सीखने में हाल तक कई साल लग जाते थे, उसे कुछ मौखिक आदेशों के जरिये आप सीधे अमल में उतार सकते हैं।

चीन का प्रयोग । बीती जुलाई के आखिरी हफ्ते में चीन से एक बड़ी सूचना आई। चीन के उच्च शिक्षा विभाग ने 2021 से 2026 के बीच गुजरे पांच वर्षों में देश भर के 12,200 मेजर (एमए स्तर के) कोर्स एक ही बार में खत्म कर दिए हैं। इनकी जगह 10,800 नए कोर्स शुरू किए गए हैं, जिनका संबंध किसी न किसी रूप में AI, क्वांटम कंप्यूटर्स और एडवांस्ड फिजिक्स से है। खत्म किए गए कोर्स लिबरल आर्ट्स, फाइन आर्ट्स और सोशल स्टडीज से हैं।
कला की मुश्किल । कोई कह सकता है कि यह तो एक किस्म की तानाशाही हुई। जिस समाज में विज्ञान-तकनीकी को कलाओं और समाज विज्ञानों की कीमत पर विकसित किया जाए, उसे किसी स्थिर व दीर्घजीवी व्यवस्था का नमूना नहीं माना जा सकता। लेकिन जरा ठहरें, जेनरेटिव AI के माहौल में अगर आप फाइन आर्ट्स-चित्रकला, मूर्तिकला, संगीत या क्रिएटिव आर्किटेक्चर पढ़ाने जा रहे हैं तो ध्यान रखना होगा कि लगन से सीखे गए किसी कलाकर्म को जेनरेटिव AI, पेंटर का सही आदेश मिल जाने के बाद बमुश्किल 30 सेकंड में खींचकर रख देगी। हालांकि यह कृति जब बाजार में बिकने जाएगी तो इसे AI की रचना साबित करने में शायद पांच सेकंड भी न लगें। जाहिर है, जैसे फोटोग्राफी की खोज के बाद चित्रकला को जड़ से अपना मुहावरा बदलना पड़ा, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल अभी उसके सामने है।

अमेरिकी रणनीति । चीनी शिक्षाविदों की व्याख्या है कि उन्होंने किसी भी शास्त्र पर कुल्हाड़ी नहीं चलाई है। सिर्फ पुराने शास्त्रों को नए माहौल के मुताबिक ढालने का प्रयास किया है, ताकि ग्लोबल होड़ से जूझ रहे जॉब मार्केट में चीनी छात्र अप्रासंगिक न होने पाएं। इसकी तुलना अन्य समाजों से करें तो अमेरिकी विश्वविद्यालयों का बौद्धिक और कार्यकारी ढांचा पाठ्यक्रमों को समाप्त करने और उनकी जगह नए पाठ्यक्रम पेश करने के बजाय पुराने पाठ्यक्रमों को अप-टु-डेट करने की रणनीति अपना रहा है। उसकी कोशिश सभी पाठ्यक्रमों को AI के मिजाज में ढालने की है।

यूरोप की लाचारी । यूरोप का सरकारी प्राधान्य वाला शैक्षिक ढांचा पूंजी की कमी से लाचार है। निजी घरानों की बदलाव में कोई रुचि नहीं और दुनिया में चल रहे दो बड़े युद्धों को देखते हुए यूरोपीय सरकारों के पास शिक्षा में किसी रेडिकल बदलाव के लिए पैसे नहीं हैं। ऐसे में उन्होंने मॉड्यूल टाइप एजुकेशन का मॉडल अपनाया है।

भारत की परेशानी । देश ने विश्वविद्यालयों की एकेडमिक काउंसिल में सीधे बड़े पूंजीपतियों को ही शामिल कर लेने का पेच आजमाया है। सरकार की राय शायद यह है कि रोजगार तो इन्हीं को देना है, वे जरूरत के हिसाब से पाठ्यक्रम बनवा लें। इस प्रक्रिया की शुरुआत बिजनेस मैनेजमेंट संस्थानों में बड़े पूंजीपति घरानों की एंट्री से हुई थी। अभी बाकी क्षेत्रों में इसके लिए जगह बनाई जा रही है। हालांकि समस्या एक ही है, पूंजीपति घरानों की गहरी गति हर क्षेत्र में नहीं हो सकती। शिक्षा की कोई फ्यूचरिस्टिक समझ छात्रों में 2030 या 2035 के लिए बनाई जा सकेगी, इसमें संदेह है।

चाहिए कुछ नया । थोड़ा और गहराई में उतरकर देखें कि एकेडमिक के तौर-तरीकों में किस तरह के बदलाव चीनी और अमेरिकी विश्वविद्यालयों में आ रहे हैं। सबसे पहले यह कि रटंत विद्या का दौर एक झटके में बीत गया है। एकेडमिक्स, चाहे वह किसी भी क्षेत्र की हो, उसका जोर आपकी रचनात्मक सोच जांचने पर होगा। मामले में आप मौलिक ढंग से घुसते हैं या नहीं, इस एक खूंटी से ही आपके परीक्षक का मन बंधा रहेगा। आपने संगीत में दाखिला ले रखा है। बाख, बीथोवन, वाग्नर या भीमसेन जोशी, गुदई महराज और शोभा गुर्टू को समझे बिना आप एक कदम आगे नहीं बढ़ पाएंगे। लेकिन, पढ़ते हुए आपका काम उनकी तानें दोहराने या छोटी-मोटी बढ़त बनाने भर से नहीं चल पाएगा। अपना ध्यान आपको उस चमक पर केंद्रित करना होगा, जो इनके काम में कुछ नया जोड़ती है। यह कोशिश ही कभी आपको वहां तक ले जाएगी, जहां आप अपनी अलग चमक भी पैदा कर पाएंगे।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)