बारिश में पकौड़े

नवभारतटाइम्स.कॉम
pakoras in rain and societal thinking a satirical analysis from delhi court to mahila morcha
'आदमी चांद पर पहुंच गया, लेकिन यहां बहस चल रही है कि लड़की ने क्या पहना, क्यों पहना, उसके किस पहनावे से अगले का मन छेड़खानी करने का हो आया। गजब हाल है। कह रहे कि लड़की की ड्रेस वैसी न होती, ऐसी होती तो अगला गलती न करता।' वाइफ गुस्से में थीं। अपन ने तो कोई गड़बड़ की नहीं थी। लेकिन, वजह पूछना भी जरूरी था। पता चला कि दिल्ली की एक अदालत में एक शख्स को बचाने के लिए लड़की के कपड़ों पर सवाल किया जा रहा था। अदालत ने फिर कड़ी फटकार लगाई और मामला सीधा किया। वाइफ इसी खबर के हवाले से जमाने की तंग नजरी पर सवाल कर रही थीं। मैंने कहा, 'सोसायटी में कुछ तो बदमाश लोग होते ही हैं, पर ज्यादातर तो अच्छे ही हैं, तभी यह सारा कामकाज चल रहा है। वरना सब बैठ न जाता?'

इतना सुनकर वाइफ ने चाय का कप टेबल पर ऐसे रखा, जैसे उसमें कोई कड़वी चीज हो। मुझे अपनी पाक कला पर शक-सा हुआ। लेकिन, चाय तो मैं हमेशा अच्छी ही बनाता हूं, सो पूरे हौसले के साथ सवालिया निगाह बनाए रखी। वह फिर शुरू हो गईं, 'एक कोई पार्टी है। पता है, उसने क्या किया है? यूपी में एक पुरुष को महिला मोर्चा का अध्यक्ष बना दिया। सोचिए, क्या सोचकर किया होगा?' मेरे पास कोई जवाब नहीं था, पर अब मूड बदलना जरूरी था। मैंने कहा, 'यह सब छोड़िए। आप तो दिल्ली की आदरणीया मुख्यमंत्री की बात पर ध्यान दीजिए। उनने साफ-साफ कहा है कि महिलाएं बच्चे पैदा करने की मशीन नहीं हैं।' यह सुनकर वाइफ का पारा नीचे आता दिखा, 'बहुत अच्छा कहा। अब ऐसे लोगों के दिमाग ठिकाने लग जाएंगे, जो चार-चार, पांच-पांच बच्चों का नारा लगाते थे।' भला हो सीएम साहिबा का, मैं राहत की सांस लेते हुए बेसन घोलने उठा। इतनी बारिश के बाद पकौड़े तलना तो लाजिम ही था।