Trust In Constitution Not Superstition In State Balancing Human Consciousness And Governance
राज्य पर अंधविश्वास नहीं, संविधान पर भरोसा चाहिए
नवभारतटाइम्स.कॉम•
शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए शुरू हुई बहस अब सार्वजनिक जीवन में नैतिकता और शासन में करुणा पर आ गई है। कुछ लोग आहत हैं कि बच्चों पर लाठियां चलीं, तो कुछ इसलिए आहत हैं कि बच्चों ने गालियां दीं। कुछ इसे राजनीति बता रहे हैं, कुछ सामाजिक जागरूकता। राजनीति का आरोप लगाने वालों का तर्क है कि धर्म और जाति के बाद अब देश को जनरेशन में बांटा जा रहा है।
जीवन से बढ़ रही दूरी प्रशासन के मामले में आधुनिक राज्य तकनीकी रूप से बेहद कुशल हो गए हैं, लेकिन वे धीरे-धीरे मनुष्य के भीतरी जीवन से दूर होते जा रहे हैं। सरकारें GDP की निगरानी कर सकती हैं, बाजारों को नियंत्रित कर सकती हैं, जनसंख्या की गिनती कर सकती हैं और सार्वजनिक राय को तुरंत प्रभावित कर सकती हैं। लेकिन, जो समाज केवल अर्थव्यवस्था से चलता है, वह इंसान की कीमत उसकी उत्पादकता से आंकने लगता है। जो राजनीति केवल पहचान पर आधारित होती है, वह नागरिकों को अलग-अलग गुटों में बांट देती है। और जो राज्य केवल नियंत्रण पर चलता है, वह धीरे-धीरे अपनी नैतिक समझ खो देता है। नागरिक फिर मतदाता, उपभोक्ता, आंकड़े या जनसांख्यिकीय श्रेणियां भर रह जाते हैं - गरिमा वाले सचेत मनुष्य नहीं। यह शासन नहीं, चेतना रहित प्रशासन है।
शायद यही वजह है कि अध्यात्म और शासन के बीच के रिश्ते पर बातचीत चुपचाप फिर लौट रही है। यहां अध्यात्म का मतलब जागरूकता, संयम, करुणा और मानवीय गरिमा की पहचान है। यह चिंता कई देशों में उभर रही है। भूटान ने ग्रॉस नैशनल हैपिनेस को GDP की जगह अपनी नीति का मुख्य मापदंड बनाया है। न्यूजीलैंड ने वांगानुई नदी को कानूनी व्यक्तित्व प्रदान किया। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया ने आदिवासी परंपराओं से निकले restorative justice के सिद्धांतों को अपनी न्याय व्यवस्था में शामिल किया है। इन प्रयासों के पीछे एक ही विचार है, नैतिक और आध्यात्मिक सोच के बिना कोई शासन अच्छा नहीं हो सकता।
संविधान में नैतिक मार्गदर्शन
भारत की सभ्यतागत चेतना ने सत्ता और धर्म के रिश्ते पर लंबे समय से विचार किया है। आम अर्थ में धर्म व्यक्तिगत आस्था का विषय है, लेकिन गहरे अर्थ में यह सिर्फ मजहब नहीं था। यह सत्ता के इस्तेमाल में नैतिक संतुलन, जिम्मेदारी और संयम की बात करता था। इस सोच की छाप संविधान में भी दिखाई देती है। मौलिक अधिकारों के साथ संविधान निर्माताओं ने राज्य के नीति निदेशक तत्व भी रखे, जो न्याय, गरिमा, समानता, कल्याण और मानवीय शासन की दिशा दिखाते हैं। ये कानून लागू करने योग्य नहीं थे, पर नैतिक मार्गदर्शन देते थे। कई मायनों में संविधान निर्माताओं ने आने वाली पीढ़ियों को गणतंत्र की अंतरात्मा को सींचने की जिम्मेदारी दी थी।
डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने चेतावनी दी थी, 'संवैधानिक नैतिकता कोई स्वाभाविक भावना नहीं है। इसे विकसित करना पड़ता है।' यह चेतावनी आज बहुत जरूरी लगती है। हम ऐसे दौर में हैं, जहां व्यवस्थाएं इंसान के ध्यान, भावनाओं और पहचान को अपने कब्जे में लेने की होड़ में हैं। राजनीति आक्रोश को बढ़ावा देती है और तकनीक विभाजन को गहरा करती है। लोग पहले से ज्यादा डिजिटल रूप से जुड़े हैं, पर भीतर से अलग-थलग हैं।
डर से रुकना नहीं
शायद 21वीं सदी का सबसे बड़ा संघर्ष वामपंथ और दक्षिणपंथ, धर्मनिरपेक्षता और धर्म या पूंजीवाद और समाजवाद के बीच नहीं, बल्कि मानवीय चेतना और उसे प्रभावित करने वाली व्यवस्थाओं के बीच होगा। इसका यह अर्थ नहीं कि राज्य को धार्मिक बन जाना चाहिए। संविधान धर्मनिरपेक्ष रहे, अधिकार सुरक्षित और संस्थाएं लोकतांत्रिक। लेकिन, भीतरी चेतना से रहित शासन आखिरकार यांत्रिक हो जाता है। कानून व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं, अधिकार स्वतंत्रता की रक्षा कर सकते हैं और संस्थाएं सत्ता का बंटवारा कर सकती हैं। लेकिन, मनुष्यता को बचाए रखने का काम केवल चेतना कर सकती है।
नीति निदेशक तत्वों में अध्यात्म को शामिल करने के खिलाफ सबसे बड़ा तर्क यह है कि राज्य इसका दुरुपयोग करते हुए अध्यात्म को संकुचित या राजनीतिक तरीके से परिभाषित कर सकता है। यह चिंता जायज है। लेकिन, दुरुपयोग की आशंका भर से नैतिक लक्ष्य को पूरी तरह छोड़ा नहीं जा सकता। लोकतंत्र में असली सुरक्षा राज्य पर अंधविश्वास नहीं, खुद संविधान है। शायद सार्वजनिक जीवन में अध्यात्म का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि राज्य आस्था को परिभाषित करें। इसका अर्थ केवल इतना हो कि राज्य यह याद रखें - मनुष्य बाजार, आंकड़ों और वोट-बैंक से कहीं अधिक है।