धन ज़रूरी, पर जीवन का उद्देश्य बन जाए तो चिंता

Contributed byसंजय तेवतिया|नवभारतटाइम्स.कॉम
greed for wealth why it becomes a cause of worry and how to find peace of mind
धन, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक सुविधाएं जीवन को आराम दे सकती हैं, लेकिन मन की शांति नहीं। इस बात से मनुष्य वाकिफ है, फिर भी वह पूरी जिंदगी इन्हीं के पीछे भागता रहता है। आखिर क्यों? इसका सबसे बड़ा कारण है असुरक्षा और तुलना।

मनुष्य को लगता है कि अधिक धन उसे सुरक्षित बनाएगा, ऊंचा पद सम्मान दिलाएगा और अधिक सुविधाएं सुखी कर देंगी। लेकिन, एक इच्छा पूरी होते ही दूसरी जन्म ले लेती है। धीरे-धीरे जरूरतें इच्छाओं में और इच्छाएं महत्वाकांक्षा में बदल जाती हैं। यही दौड़ मन की शांति छीन लेती है।
समस्या धन या सफलता में नहीं, उससे हमारे गहरे लगाव में है। धन जीवन के लिए जरूरी है, लेकिन जब धन ही जीवन का उद्देश्य बन जाए, तब भीतर खालीपन पैदा होने लगता है। आध्यात्मिक दृष्टि से इसका पहला उपाय है आत्मचिंतन। दूसरा उपाय है संतोष। तीसरा उपाय है निष्काम कर्म।

जीवन का उद्देश्य केवल अधिक पाना नहीं, बल्कि भीतर से समृद्ध होना है। धन कमाइए, सफलता पाइए, प्रतिष्ठा अर्जित कीजिए, लेकिन इनके स्वामी बनिए, गुलाम नहीं। क्योंकि बाहरी संपत्ति जीवन को सुविधाजनक बना सकती है, पर आंतरिक शांति ही उसे सार्थक बनाती है।