जान दांव पर लगा इन्होंने भरे विभाजन के ज़ख्म

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humanitys balm on the wounds of partition the priceless service of volunteers
उमस भरी गर्मी के बीच मोहम्मद अली जिन्ना 7 अगस्त, 1947 को सफदरजंग हवाई अड्डे से कराची रवाना हुए। उनके जाने से पहले ही किशनगंज, दरियागंज, करोल बाग, पहाड़गंज समेत कई इलाकों में सांप्रदायिक तनाव और दंगे जारी थे। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर घायलों और आतंकित शरणार्थियों का सैलाब पहुंच रहा था। हिंदू, मुसलमान और सिख - सभी हिंसा के शिकार थे। ऐसे में सरकार के अलावा कई स्वयंसेवी संगठन भी लोगों की मदद में जुट गए।

मानवता की मिसाल । लोगों की मदद करने में दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी (DBS) सबसे आगे रही। सन 1877 में स्थापित DBS के मिशन ने सेंट स्टीफंस कॉलेज और अस्पताल की स्थापना में अहम भूमिका निभाई। इसके स्वयंसेवक घायल शरणार्थियों को अस्पताल पहुंचाते और जरूरतमंदों को ब्रदरहुड हाउस में अस्थायी आसरा देते। धर्म से परे यह सेवा मानवीय मदद की मिसाल बनी।
कई मददगार । तब सिर्फ DBS ही नहीं, आर्य समाज से जुड़े लोग भी राहत कार्यों में जुटे थे। इन स्वयंसेवकों ने सीमा पार से आने वाले शरणार्थियों की सुरक्षा, राहत शिविरों की व्यवस्था और भोजन बांटने का जिम्मा लिया। दिल्ली और पंजाब में राहत समितियां बनाई गईं। जत्थेदार संतोख सिंह के नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य सिख संगठनों ने भी खाने-पीने, चिकित्सा और सुरक्षा का इंतजाम किया। रेडक्रॉस भी जरूरी दवाइयों के इंतजाम में लगा था। लेडी माउंटबेटन के नेतृत्व में यूनाइटेड काउंसिल फॉर रिलीफ एंड वेलफेयर ने कई गैर-सरकारी संगठनों के राहत कार्यों में समन्वय किया।

एक दुखद कहानी । कांग्रेस की राहत समितियों, कस्तूरबा कार्यकर्ताओं, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की दिल्ली शाखा और अन्य महिला समूहों ने लोगों के खाने-पीने, पहनने और बच्चों की जिम्मेदारी उठाई। डॉ. एन.सी. जोशी जैसे डॉक्टर करोल बाग समेत कई इलाकों में घायलों का इलाज कर रहे थे। दुखद है कि दंगे में उनकी भी हत्या कर दी गई। आज करोल बाग का जोशी अस्पताल उन्हीं के नाम पर है। लेडी हार्डिंग कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. के.जे. मैक्डरमॉट और उनकी सहयोगी डॉ. ओ.पी. बाली रोजाना 18 घंटे मरीजों की सेवा करतीं। गांधीजी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर भी शरणार्थियों और घायलों की मदद कर रही थीं। बाद में वह दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं।

यादों में बसे । विभाजन ने दिल्ली को गहरे जख्म दिए। लाखों लोग विस्थापित हुए और हजारों की जान गई। लेकिन, इसी अंधेरे में स्वयंसेवकों की मानवता की रोशनी भी दिखाई दी। कई बुजुर्ग आज भी उन लोगों को याद करते हैं, जिन्होंने दंगों के बीच बिना किसी स्वार्थ के घायल और बेसहारा लोगों की सेवा की। उन्होंने इंसानियत की मशाल जलाए रखी।