अपने गोल्ड को काम पर लगाइए

Contributed byनीलेश शाह|नवभारतटाइम्स.कॉम
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'भारत कस्तूरी मृग की तरह व्यवहार कर रहा है। उसके पास गोल्ड के रूप में कस्तूरी है, लेकिन विकास के लिए वह FDI, FPI और विदेशी कर्ज पर निर्भर रहता है। नया पैसा खोजने से ज्यादा जरूरी अपने पास मौजूद गोल्ड को प्रॉडक्टिव कैपिटल में बदलना है।' यह कहना है कोटक म्यूचुअल फंड के एमडी नीलेश शाह का। उनका मानना है कि देश को अब अपनी ही संपत्ति के इस्तेमाल के लिए नए रास्ते तलाशने होंगे। उनसे सुधा श्रीमाली की बातचीत के मुख्य अंश :

n गोल्ड की इमोशनल वैल्यू भारत में बहुत ज्यादा है। ऐसे में घरेलू सोने में से कितना वित्तीय सिस्टम में लाना संभव है?
हमारा एक्सपोर्ट पिछले 25 साल में केवल एक बार इम्पोर्ट से ज्यादा रहा है। अगर आप आयात में से गोल्ड, सिल्वर और डायमंड को निकाल दें तो भारत की अर्थव्यवस्था सरप्लस हो जाती है। इस सदी के 25 वर्षों में हमने करीब 15-16 हजार टन सोना नेट बेसिस पर आयात किया। देश में लगभग 35,000 टन घरेलू सोना है। बेशक, यह लोगों का है और इससे उनका भावनात्मक जुड़ाव है। सरकार सीधे लोगों से सोना नहीं मांग सकती। इसलिए हमें ऐसे इंस्ट्रूमेंट बनाने होंगे जो लोगों की भावनात्मक और आर्थिक, दोनों जरूरतों को ध्यान में रखें।

n इसकी शुरुआत कैसे हो सकती है?

पहला रास्ता गोल्ड रिसाइक्लिंग है। मेरा अनुमान है कि 35,000 टन में से करीब 1,000 टन ऐसा सोना हो सकता है, जिसे लोग वित्तीय सिस्टम में ला सकते हैं। आज जूलर निर्यात के लिए 10-12% ब्याज पर गोल्ड उधार लेता है। अगर ऐसी व्यवस्था बने कि लोग अपना सोना 4-5% ब्याज पर उधार दें, बीच का खर्च 2-3% हो और जूलर की लागत भी कम हो, तो सभी को फायदा होगा। दूसरा रास्ता गोल्ड बॉन्ड हो सकता है। कई लोग छोटी-छोटी मात्रा में- 1, 5 या 10 ग्राम सोना खरीदते हैं और उस पर जूलर व डिस्ट्रीब्यूशन मार्जिन के कारण 20-40% तक ज्यादा कीमत चुकाते हैं। इन्हें गोल्ड बॉन्ड की ओर शिफ्ट किया जा सकता है।

n सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड में क्या गलती हुई?

सरकार ने सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड के सामने फिजिकल गोल्ड नहीं खरीदा। जब ब्याज दरें और सोने की कीमतें बढ़ीं तो सरकार की उधार लेने की लागत बढ़ गई। जितना गोल्ड बॉन्ड जारी हो, अगर उतना ही गोल्ड RBI खरीदकर अपनी बैलेंस शीट में रखे तो तस्वीर अलग होगी। पिछले 25 वर्षों में भारत ने करीब 500 अरब डॉलर का सोना नेट बेसिस पर आयात किया। अगर इसमें से 100 अरब डॉलर का सोना गोल्ड बॉन्ड के जरिए आता और वह RBI के रिजर्व में रहता तो आज उसका बाजार मूल्य कहीं ज्यादा होता।

n सरकार गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम लेकर आई, लेकिन कई कारणों से वह चली नहीं। इसको सफल बनाने के लिए इसमें तीन बड़े बदलाव क्या होने चाहिए?

पहली बात, इसे केवल बैंकों के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। दूसरा, गोल्ड लेंडिंग में GST शून्य होना चाहिए। सोना उधार देते समय और वापस लेते समय GST लगेगा तो लागत बढ़ेगी और मॉडल काम नहीं करेगा। तीसरा, 500 ग्राम जैसी न्यूनतम सीमा नहीं होनी चाहिए। 5 ग्राम हो, 100 ग्राम या 500 ग्राम- सिस्टम को सभी के लिए खुला रखना चाहिए। और सबसे जरूरी बात, सरकार को लॉन्च के बाद लोगों का फीडबैक लगातार लेना होगा।

n गोल्ड लोन को MSME और छोटे कारोबारियों के लिए प्रॉडक्टिव कैपिटल कैसे बनाया जा सकता है?

अभी गोल्ड लोन का इस्तेमाल शॉर्ट टर्म जरूरतों के लिए होता है। हमें इसे बिजनेस और वर्किंग कैपिटल के लिए लंबी अवधि तक इस्तेमाल करने योग्य बनाना होगा। इसके लिए लेंडर्स को प्रोत्साहन देना होगा और ब्याज दरें कम करनी होंगी।

n आम निवेशक डिजिटल गोल्ड और Gold ETF को एक जैसा मानता है। इसमें क्या फर्क समझना चाहिए?

Gold ETF ज्यादा रेगुलेटेड है। इसमें SEBI का रेगुलेटरी फ्रेमवर्क है। म्यूचुअल फंड, ट्रस्टी, AMC, कस्टोडियन और अंडरलाइंग गोल्ड- सभी पर नियंत्रण और संतुलन है। ETF में यह सुनिश्चित किया जाता है कि निवेश के पीछे वास्तविक गोल्ड मौजूद हो। डिजिटल गोल्ड में फिलहाल ऐसी रेगुलेटरी व्यवस्था नहीं है।

n हाउसहोल्ड गोल्ड को इंफ्रास्ट्रक्चर फाइनेंसिंग से भी जोड़ा जा सकता है?

बिल्कुल, हमारे पास GDP के करीब 125% के बराबर गोल्ड होल्डिंग है। 1,000 टन सोना वित्तीय सिस्टम में आ जाए तो करीब 70 अरब डॉलर की पूंजी जुट सकती है। इसका इस्तेमाल इंफ्रास्ट्रक्चर, कारोबार और खपत बढ़ाने में किया जा सकता है।

n इन सभी चीजों को संभव करने के लिए सरकार से आपकी तीन सिफारिशें क्या होंगी?

एक हाई पावर्ड ग्रुप बनाया जाए। इसमें RBI, SEBI, जूलर्स और मार्केट एक्सपर्ट्स शामिल हों। उसे भारत के 10-15% हाउसहोल्ड गोल्ड को मोनेटाइज करने का लक्ष्य देना चाहिए। इसके लिए गोल्ड बॉन्ड, गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम, गोल्ड बेक्ड क्रिप्टो और दूसरे नए इंस्ट्रूमेंट पर काम किया जाए। दूसरी बात, इनोवेशन को रोकना नहीं चाहिए। El Salvador की एक कंपनी ने करीब 3 अरब डॉलर का gold-backed crypto लॉन्च किया है। भारत भी ऐसा मॉडल विकसित कर सकता है।

n गोल्ड ETF में पिछले दो साल में रिटेल इन्वेस्टर्स का व्यवहार कैसे बदला है?

दो तरह के निवेशक हैं। एक, जो अच्छा रिटर्न देंखकर आए हैं। दूसरे, जिन्हें लगता है कि अमेरिकी डॉलर पर भरोसा कुछ कम हो रहा है और पोर्टफोलियो में कुछ हिस्सा गोल्ड में होना चाहिए।